अभी भारतीय रेल के निजीकरण की चर्चा जोरों पर है। रेलवे बोर्ड के चेयरमैन वीके यादव ने कहा कि निजीकरण से बड़े पैमाने पर निवेश आएगा। साथ में उन्होंने यह भी कहा कि प्राइवेट ट्रेन अपना किराया तय कर सकती हैं।

कोरोना के कारण मोदी सरकार के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह रेलवे (Railway Privatisation) की जरूरतों का ठीक से खयाल रख सके। ऐसे में सरकार अब रेलवे के निजीकरण की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है। जुलाई के महीने में केंद्र ने निजी कंपनियों से कहा था कि वे 109 ओरिजिन डेस्टिनेशन के लिए 151 प्राइवेट ट्रेन चलाने के लिए अपना प्रस्ताव डालें। इस रेस में कई कंपनियां हैं।

किराया तय करने की इजाजत होगी
भारतीय रेल बोर्ड के चेयरमैन वीके यादव (Indian Rail Board Chairman VK Yadav) ने बताया कि प्राइवेट कंपनियों को अपनी तरह से किराया तय करने की इजाजत होगी। हालांकि उन रूट पर अगर एसी बसें और प्लेन की भी सुविधा हैं, तो किराया तय करने के पहले कंपनियों को इस बात का ध्यान रखना होगा।

स्टेशनों के मॉडर्नाइजेशन में भी प्राइवेटाइजेशन
निजी निवेशकों को लुभाने के लिए सरकार तमाम रियायतें दे रही है। मोदी सरकार स्टेशनों के मॉडर्नाइजेशन से लेकर ट्रेन संचालन तक में निजी कंपनियों की एंट्री दे रही है। इस बात को समझने की जरूरत है कि भारत में रेलवे का किराया और इससे संबंधित फैसले राजनीतिक रहे हैं। गरीब लोगों के लिए रेलवे परिवहन का मुख्य साधन रेलवे ही है।

50 हजार करोड़ से ज्यादा आएगा निवेश
वीके यादव का कहना है कि निजी कंपनियां अगले पांच सालों में रेलवे पर 7.5 अरब डॉलर यानी 55 हजार करोड़ से ज्यादा रुपये खर्च करेंगे। इससे रेलवे के इन्फ्रास्ट्रक्चर में काफी सुधार होगा, साथ ही ट्रेन की ऐवरेज स्पीड भी बढ़ेगी। ऐवरेज स्पीड इसलिए गंभीर मुद्दा है क्योंकि मोदी सरकार 2023 तक जापान से सस्ती दरों पर मिलने वाले कर्ज से बुलेट ट्रेन बनाने की योजना बना रही है।