जैसलमेर के सोनू रेलवे स्टेशन पर प्लेटफार्म पर फंसी मालगाड़ी।

सरहदी जैसलमेर में निकलने वाले बेहतरीन क्वालियटी के लाइम स्टोन को देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचाने के लिए दो दिन पूर्व शुरू किए सोनू रेलवे स्टेशन पर एक मालगाड़ी प्लेटफार्म पर फंस गई। प्लेटफार्म से मालगाड़ी ऐसी फंसी कि निकली ही नहीं। आखिरकार प्लेटफार्म को तोड़कर मालगाड़ी को निकालना पड़ा। इससे पहले सिर्फ दो मालगाड़ी इस स्टेशन से निकली थी। अब रेलवे ने पूरे मामले की जांच के आदेश दिए है। रेलवे की एक टीम सोनू पहुंच चुकी है।

लाइम स्टोन का सीधा लदान करने के लिए सोनू रेलवे स्टेशन का निर्माण कर हमीरा से वहां तक रेल लाइन बिछाई गई है। दो दिन पूर्व ही सका विधिवत उद्घाटन किया गया। उद्घाटन के पश्चात भिलाई व बोकारों के लिए दो मालगाड़ियों को रवाना किया गया था। उस समय किसी प्रकार की बाधा नहीं आई। सोनू रेलवे स्टेशन पर गुरुवार सुबह प्लेटफार्म पर लगी तीसरी मालगाड़ी में कल देर शाम तक लाइम स्टोन से लादा गया। जब मालगाड़ी को वहां से रवाना किया गया तो यह प्लेटफार्म पर फंस गई। कर्मचारियों ने कई घंटों तक मशक्कत की, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। मालगाड़ी अपने स्थान से बिलकुल भी नहीं हिल पाई। आखिरकार देर रात मालगाड़ी को निकालने के लिए प्लेटफार्म तोड़ने का निर्णय लेना पड़ा। दो जेसीबी लगा कर प्लेटफार्म का बड़ा हिस्सा तोड़ा गया। इसके बाद कहीं जाकर मालगाड़ी निकल सकी। प्लेटफार्म तोड़ मालगाड़ी निकालने की देश में यह संभवतया पहली घटना है। इसके बाद रेल अधिकारियों में हड़कंप मचा हु्आ है। फिलहाल अधिकारी तय नहीं कर पा रहे है कि आखिरकार क्या हुआ। कुछ अधिकारी प्लेटफार्म निर्माण को गलत ठहरा रहे है। वहीं कुछ तकनीकी जानकार मालगाड़ी के एक तरफ झुकाव को कारण बता रहे है। फिलहाल पूरा कारण तो जांच के बाद ही सामने आ पाएगा।


लंबे इंतजार के बाद दो दिन पूर्व शुरू हुआ था संचालन
सोनू-हमीरा रेल लाइन पर लंबे इंतजार के बाद दो दिन पूर्व ही रेलों का संचालन शुरू हुआ था। सोनू-हमीरा रेल लाइन का निर्माण कार्य दिसम्बर 2019 में पूरा हो गया था, लेकिन कुछ तकनीकी कारणों व अन्य जरूरी प्रक्रियाओं के चलते 58.50 किलोमीटर लंबे ट्रैक पर मालगाड़ियों का संचालन शुरू नहीं हो पा रहा था। करीब 350 करोड़ रूपए की लागत से बने इस रेलवे ट्रैक पर मालगाड़ियों के संचालन के लिए पिछले कई सालों से प्रयास किए जा रहे थे। आरएसएमएम को भी अपना लाईमस्टोन को ट्रकों के जरिये 70 किलोमीटर दूर जैसलमेर भिजवाना पड़ रहा था। इसके कारण लाइमस्टोन अपेक्षाकृत महंगा पड़ रहा था।