पश्चिम रेलवे कोलोनी में टूटी एक मकानों में जमी कायी। अमर उजाला

रेलवे कॉलोनी में रहने वाले कर्मचारियों की बारिश शुरू होने के साथ ही परेशानियां बढ़ गई हैं। बरसात में रेलवे क्वार्टरों की छत लीक कर रही है तो टूटे दरवाजे, खिड़कियां न सुधरने से मच्छर व कीड़े-मकोड़ों ने रहना दूभर कर दिया है। तमाम शिकायतें होने के बाद भी अफसर सुनवाई नहीं कर रहे हैं।

रेलवे कॉलोनी के अधिकतर क्वार्टरों में बरसात के दिनों में पानी टपकता है। किसी क्वार्टर की छत से तो किसी के बाथरूम में पानी टपक रहा है। कई क्वार्टरों की दीवारें चटक गईं हैं तो कई क्वार्टर के पीछे बने गटर से बदबू आ रही है। यहाँ तक कि गटर का पानी वापिस घरों में जाता है। रेलवे कॉलोनियों में पीने के पानी के पाइप में लीकेज होने से गटर का पानी पाइपों में जा रहा है और रेल कर्मी गन्दा पानी पीने को मजबूर हैं। 

बिजली की तारें भी नंगी पड़ी रहती हैं और बरसात में उनसे करंट लगने का खतरा हमेशा बना रहता है। स्टाफ की कमी होने के कारण बिजली और सिविल विभाग मरम्मत करने में भी असमर्थ हैं।

 बारिश के पानी की समस्या से बचाने के लिए दो सौ से अधिक क्वार्टरों की छत पर आधुनिक प्री कोडेट शीट लगाई गई, लेकिन वह भी पानी को रोकने के लिए नाकाफी हो रही है। दूसरा, रेलवे क्वार्टरों में इन दिनों आधे घंटे की पानी की सप्लाई हो रही है। पानी भी पीला व गंदा आ रहा है। इस कारण कर्मचारियों को आरओ का पानी पीना पड़ रहा है।

दरअसल, रेल प्रशासन  अफसरों केबंगलों के रखरखाव का तो पूरा ध्यान रखता है, निचले कर्मचारियों की  कॉलोनी में रहने वाले कर्मचारियों के क्वार्टरों के रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया जाता है। ऐसे में सामान्य कर्मचारियों के लिए यहां-वहां चक्कर काटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। रेलमंत्री भी अपने किसी भी विज़न में रेलवे कॉलोनियों के रखरखाव के बारे में जिक्र नहीं करते हैं जिससे कर्मचारियों का मन रेलवे कोलोनियों से उठता जा रहा है। वहीँ दूसरी तरफ यूनियन का कहना है कि रेलवे कोलोनियों के लिए अलग से बजट बने और पैसे का सदुपयोग सुनिश्चित करते हुए यदि मन से काम हो तभी कलोनियों की दशा में सुधार हो सकता है वरना रेलवे के मकान में जीना मुहाल है।