प्रमोशन में आरक्षण का मामला फिर सुर्खियों में है। इस बीच बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है और कहा है कि मामला पेंडिंग रहने के कारण एससी-एसटी को प्रमोशन में आरक्षण नहीं दे पा रही है। वहीं, केंद्र सरकार ने कहा है कि उनकी अर्जी भी लटकी है और एक लाख से ज्यादा कर्मियों का प्रमोशन रुका हुआ है। महाराष्ट्र और झारखंड की ओर से भी यह मामला उठाया गया है। बिहार सरकार की दलील के बाद कोर्ट ने नोटिस जारी कर दो हफ्ते बाद सुनवाई की बात कही है।








बिहार सरकार की ओर से दलील दी गई कि सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल 2019 को मामले में यथास्थिति बहाल कर दी थी। इस कारण उसके बाद से वह एससी-एसटी को प्रमोशन में आरक्षण नहीं दे पा रही है। अदालत से गुहार लगाई गई कि जब तक मामला पेंडिंग है, उस दौरान 15 अप्रैल 2019 से पहले की स्थिति बरकरार रखी जाए। दूसरी ओर, केंद्र ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती




दिल्ली हाई कोर्ट ने क्या कहा था
दिल्ली हाई कोर्ट ने डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनेल एंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) के उस मेमोरेंडम को रद्द कर दिया है, जिसके तहत अनुसूचित जाति/जनजाति को 1997 के बाद भी प्रमोशन में रिजर्वेशन का फायदा देने के नियम को जारी रखने का निर्देश दिया गया था। हाई कोर्ट ने डीओपीटी के 13 अगस्त, 1997 के मेमोरेंडम को कानून के विरुद्ध बताया था। बेंच ने अपने आदेश में कहा था कि इंदिरा साहनी या नागराज मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से साफ है कि एससी-एसटी को पहली नजर में प्रतिनिधित्व का आंकड़ा तैयार किए बिना या अनुचित प्रतिनिधित्व के आधार पर पिछड़े के तौर पर देखना गलत है। इससे संविधान के अनुच्छेद 16(1) और 335 का उल्लंघन हो रहा है।




 इंदिरा साहनी मामले में जजमेंट : सुप्रीम कोर्ट की 9 मेंबरों की बेंच ने 16 नवंबर 1992 से 5 साल के लिए एससी-एसटी कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण देने की इजाजत दी थी। बाद में संविधान में संशोधन कर यह व्यवस्था की गई कि अगर राज्य को यह लगता है कि किसी सर्विस में एससी-एसटी कैटेगरी के लोगों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है तो वह इस श्रेणी के लोगों को प्रमोशन में कोटा दे सकती है।

एम. नागराज मामला : 2006 में नागराज से संबंधित वाद में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने कहा था कि सरकार एससी-एसटी को प्रमोशन में आरक्षण दे सकती है, लेकिन शर्त लगा दी। कहा कि इससे पहले यह देखना होगा कि प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है, पिछड़ापन है और पिछड़ेपन को देखने के लिए आंकड़े देने होंगे।

सुप्रीम कोर्ट का 26 सितंबर 2018 का फैसला : शीर्ष अदालत ने नागराज से संबंधित वाद में दिए गए फैसले को 7 जजों को रेफर करने से मना कर दिया था। हालांकि कहा कि प्रमोशन में आरक्षण से पहले पिछड़ेपन का डेटा एकत्र करने की जरूरत नहीं है। क्रीमीलेयर का सिद्धांत लागू करना होगा।