अगर सब कुछ ठीक रहा तो आने वाले करीब दस साल में अमृतसर से दिल्ली का सफर मात्र 30 मिनट में सिमट जाएगा। अभी इसमें पांच से छह घंटे लगते हैं। पंजाब सरकार ने अमृतसर-लुधियाना-चंडीगढ़ और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) कॉरिडोर में अत्यधिक तेज गति वाले हाइपरलूप ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट की संभावना तलाशने का फैसला किया है। इसके लिए पंजाब सरकार ने लॉस एंजलिस की कंपनी वर्जिन हाइपरलूप वन के साथ समझौता किया है। कंपनी इसमें दुबई के निवेशक डीपी वल्र्ड का सहयोग लेगी।








मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, डीपी वल्र्ड के उपमहाद्वीप के सीईओ रिजवान सुमर की मौजूदगी में इस एमओयू पर पंजाब सरकार की तरफ से ट्रांसपोर्ट विभाग के प्रमुख सचिव के शिवा प्रसाद और वर्जिन हाइपरलूप वन कंपनी के भारत के प्रबंध निदेशक हर्ज धालीवाल ने दस्तखत किए। कंपनी हरियाणा सरकार के साथ भी एमओयू साइन करेगी। पंजाब इस प्रोजेक्ट के लिए रुचि दिखाने वाला महाराष्ट्र के बाद देश का दूसरा राज्य बन गया है।

छह हफ्तों में पूरा होगा अध्ययन: पंजाब के सलाहकार मोशे कोहली के मुताबिक, प्रोजेक्ट का पूर्व संभावित अध्ययन छह हफ्तों में पूरा हो जाएगा। इसमें प्रोजेक्ट की लागत, मांग व कॉरिडोर के सामाजिक, आर्थिक लाभ जैसे अलग-अलग पहलुओं का मूल्यांकन किया जाएगा।




भूमि अधिग्रहण बड़ी चुनौती: पंजाब में ऐसे बड़े प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण बड़ी चुनौती होगा। क्योंकि फोर-लेन या सिक्स लेन के कई प्रोजेक्ट पंजाब में सालों तक लटके रहने के बाद पूरे हो पाए हैं। इसके अलावा लुधियाना मेट्रो और चंडीगढ़ मेट्रो जैसे प्रोजेक्ट तो अभी तक फाइलों में हैं।

क्या है हाइपरलूप तकनीक: परिवहन क्षेत्र में क्रांति लाने वाले हाइपरलूप का कॉन्सेप्ट ‘एलन मस्क’ ने दिया और इसे ‘परिवहन का पांचवां मोड़’ भी बताया। विशेष प्रकार के स्टील के कैप्सूल या पॉड्स को हवा रहित पाइप के अंदर एक स्थान से दूसरे स्थान तक चलाया जाता है।




कैसे करती है काम

इसमें यात्रियों को बैठाकर या कागरे लोड कर इन कैप्सूल्स या पॉड्स को जमीन के ऊपर बड़ी-बड़ी पारदर्शी पाइपों में इलेक्टिकल चुंबक पर चलाया जाता है। चुंबकीय प्रभाव से ये पॉड्स ट्रैक से कुछ ऊपर उठ कर चलते हैं, जिससे गति ज्यादा हो जाती है और घर्षण कम होता है। हवा की अनुपस्थिति में पॉड्स में बैठकर 1000-1300 किलोमीटर प्रतिघंटे की स्पीड से यात्र की जा सकती है।

सुरक्षा की फुल गारंटी

पायलट की गलती व मौसम संबंधी खतरों से बचने के लिए इसे स्वचालन तकनीक से युक्त किया गया है। मोड़ के कैप्सूल पाइप या सुरंग से न टकराएं, इसके लिए स्पीड को नियंत्रित किया जाता है। इसका निर्माण भूमिगत सुरंगों व जमीन के ऊपर खंभों पर भी किया जा सकता है।