भविष्य निधि यानी पीएफ का निवेश कहां और कैसे हो, इस पर अभी कर्मचारियों का कोई वश नहीं है लेकिन आने वाले समय में कर्मचारियों को अपनी रकम के निवेश के बारे में खुद निर्णय करने का अधिकार मिल सकता है। इस संबंध में ईपीएफओ में विचार चल रहा है। इसके तहत कर्मचारियों से पूछा जाएगा कि पीएसयू और निजी क्षेत्र की विभिन्न कंपनियों में से वे किन-किन कंपनियों के शेयरों या डेट प्रपत्रों में अपनी जमा रकम का निवेश किया जाना पसंद करेंगे। इससे उन्हें बेहतर रिटर्न के साथ पूंजी बाजार और अर्थव्यवस्था के संबंधों व प्रक्रियाओं की जानकारी भी प्राप्त होगी।








अभी कर्मचारी भविष्य निधि के कोष के निवेश का निर्णय ईपीएफओ के ट्रस्टी बोर्ड से जुड़ी निवेश समिति करती है। इसमें कर्मचारियों के प्रतिनिधि के तौर पर यूनियनों के पदाधिकारी होते हैं, जो विशेषज्ञों की सहायता से निवेश के बारे में निर्णय लेते हैं। इस व्यवस्था में कर्मचारियों को अपने पैसों के निवेश के बारे में व्यक्तिगत रूप से निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है। वास्तविक रिटर्न कुछ भी, उन्हें ईपीएफओ द्वारा निर्धारित सुनिश्चित ब्याज दर से ही संतोष करना पड़ता है। इसमें सुरक्षा तो है लेकिन नुकसान भी है।




परंतु भविष्य में ये स्थिति बदल सकती है। और ऐसा ईपीएफ के निवेश पर घटते रिटर्न के कारण होगा। मौजूदा नियमों के तहत भविष्य निधि के फंड का 85 परसेंट निवेश डेट प्रपत्रों अर्थात बांड और डिबेंचर में किया जाता है। अभी तक यह निवेश पीएसयू के बांडों के अलावा निजी कंपनियों के डिबेंचर में भी होता था। परंतु सीबीटी की हाल की बैठक के बाद निजी डिबेंचर में निवेश पर रोक लगा दी गई है। शेष 15 परसेंट निवेश इक्विटी प्रपत्रों में करने की छूट है, जिसे एक्सचेंज ट्रेडेड फंडों के माध्यम से किया जाता है।

अभी ईपीएफओ 4.5 करोड़ से ज्यादा कर्मचारियों की भविष्य निधि की 13.33 लाख करोड़ तथा पेंशन निधि की लगभग सवा 3 लाख करोड़ रुपये की राशियों का प्रबंध संभालता है। लेकिन इनके निवेश, खासकर शेयरों में निवेश से वांछित रिटर्न नहीं मिल रहा है। इसलिए सीबीटी सदस्यों के एक वर्ग ने निवेश के बारे में कर्मचारियों से सीधे राय लिए जाने पर विचार करने का का सुझाव दिया है। इन सदस्यों का कहना है कि जब ईपीएफओ के विशेषज्ञ कर्मचारियों को उचित रिटर्न दिलाने में असमर्थ हैं तो क्यों न कर्मचारियों को ही निर्णय लेने दिया जाए। आखिर ये उनका ही पैसा है।




दरअसल, कर्मचारियों की गाढ़ी कमाई की सुरक्षा को प्राथमिकता देने के कारण ईपीएफओ केवल पीएसयू के शेयरों में पैसा लगाता है। जबकि सभी जानते हैं कि पीएसयू के मुकाबले निजी ब्लू चिप कंपनियों के शेयर ज्यादा आकर्षक होते हैं। यदि आम निवेशकों को विकल्प चुनने को कहा जाए तो वो दोनो का मिश्रण पसंद करेंगे। जैसा कि म्यूचुअल फंडों के मैनेजर करते हैं। सीबीटी के एक वर्ग का मानना है कि यदि ईपीएफओ उचित रिटर्न नहीं दिला सकता तो उसे कर्मचारियों के पैसों को शेयरों में लगाने का अधिकार नहीं होना चाहिए। उसे केवल पीएसयू व सरकारी बांडों में पैसा लगाना चाहिए।

’>>शेयरों में निवेश से वांछित रिटर्न न मिलने से इस विचार को मिल रहा बल

’>>ईपीएफओ सीबीटी का एक वर्ग कर्मचारियों को ये अधिकार देने के पक्ष में