आईआरसीटीसी की वेबसाइट में सेंधमारी चल रही है। सुबह 10 से 12 बजे के बीच किसी भी एजेंट के तत्काल टिकट बुकिंग करने पर प्रतिबंध है। इसलिए विभाग के एजेंट निजी आईपी एड्रेस से तत्काल टिकट की बुकिंग कराते हैं। एडवांस सॉफ्टवयेर की मदद से सेंधमारी के चलते बृहस्पतिवार को आईआरसीटीसी की वेबसाइट तीन बार ठप हुई। लेकिन विभाग 24 घंटे बाद भी इसका पता नहीं लगा सका। .








टिकट बुकिंग नहीं होने के कारण उपभोक्ताओ ने सोशल मीडिया पर रेलवे की जमकर खिंचाई की। आईआरसीटसी के प्रवक्ता ने बताया कि बृहस्पतिवार को सुबह 10.10 मिनट से 10.30 मिनट, फिर 11 बजे से 11.20 मिनट और 12 बजे के बाद वेबसाइट का सर्वर अचानक डाउन हो गया। कर्मियों ने हर बार पूरे सिस्टम को री-स्टार्ट कर चालू किया। पूछने पर प्रवक्ता ने बताया कि विशेषज्ञ अचानक बार-बार सर्वर डाउन होने का कारण अभी तक नहीं पता लगा पाए हैं।




वहीं रेलवे सूत्रों ने बताया कि आईआरसीटीसी के एजेंट निजी आईपी एड्रेस पर सुबह प्रतिबंध के बावजूद तत्काल टिकट की बुकिंग करा लेते हैं। गौरतलब है कि सुबह 10 बजे से एसी श्रेणी व 11 बजे से स्लीपर श्रेणी के तत्काल टिकट की बुकिंग आम जनता के लिए खोली जाती है। इस दौरान *एजेंटों के टिकट बुक करने पर प्रतिबंध रहता है।.

मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की : सूत्रों के मुताबिक आठ साल पहले रेलवे ने आईआरसीटीसी और पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम (पीआरएस) के *बीच गेटवे का काम कर रही अंतरराष्ट्रीय सॉफ्टवेयर कंपनी ब्रॉड विजन को *हटा दिया था। इसके स्थान पर *रेलवे सूचना प्रणाली केंद्र (क्रिस) के मिडिल वेयर नामक सॉफ्टवेयर शुरू किया गया। .




दावा किया गया था कि निजी कंपनी के सॉफ्टवेयर के हटाने के बाद वेबसाइट में सेधमारी नहीं हो सकेगी। इसके बाद वेबसाइट अपग्रेड करने के लिए क्रिस को 50 करोड़ रुपये दिए गए। कहा *गया कि इससे अधिक लोड होने पर वेबसाइट स्लो नहीं होगी। लेकिन *रेलवे के तमाम उपायों के बावजूद वेबसाइट में सेंधमारी यथावत चल रही है। हालांकि आईआरसीटीसी के प्रवक्ता का कहना है कि सेंधमारी को कर्मचारी पकड़ लेते हैं और उसे डी-एक्टीवेट कर देते हैं।.

एजेंट आईआरसीटीसी के आईपी एड्रेस के बजाय निजी आईपी एड्रेस से तत्काल टिकट की बुकिंग करा लेते हैं। इसके लिए एडवांस सॉफ्टवेयर इस्तेमाल किए जाते हैं। ये साफ्टवेयर आसानी से आईआरसीटसी में सेंधमारी कर सकते हैं। यह सॉफ्टवेयर आठ से 10 हजार रुपये में मार्केट में उपलब्ध हैं। रेलवे के अधिकारी भी इस बात को मानते हैं कि एजेंट यह खेल करते हैं, लेकिन इसकी रोकथाम के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। .