ढलान में खड़े ट्रक या दूसरे चार पहिया वाहनों के पहिए के पास ईंट का टुकड़ा या पत्थर का ओट आपने कई बार देखा होगा। चालक ऐसा इसलिए करते हैं, ताकि उसे लुढ़कने से बचाया जा सके। पर क्या आप जानते हैं कि रेलगाड़ी को लुढ़कने से बचाने के लिए भी कुछ ऐसे ही नुस्खे अपनाए जाते हैं। जी हां, ढलान वाले रेलवे ट्रैक पर खड़ी टेन को रोकने के लिए रेलवे उसके पहिए में जंजीर बांधकर ताला जड़ देती है। यह प्रक्रिया कोई नयी नहीं बल्कि अंग्रेजों के जमाने की है। इसके लिए रेलवे कर्मचारी की ड्यूटी भी लगाती है।








ईस्ट इंडियन रेलवे में नियम बनाया गया था कि अगर कोई ट्रेन अधिक समय या पूरे दिन के लिए स्टेशन पर रुकती है तो उसके किसी एक पहिए को जंजीर से बांधकर उसमें ताला लगाकर सुरक्षित किया जाए। अंग्रेज तो चले गए पर आज 72 सालों बाद भी टेनों को लुढ़कने से बचाने का यही विकल्प है।




तब पांच-छह डब्बे की होती थी टेन : ब्रिटिश जमाने में ट्रेन में पांच से छह बोगियां ही होती थीं। ऐसे में ढलान वाली जगहों पर लुढ़कने से रोकने के लिए ट्रेन के पहिए को बांधने का नियम बना। अब 24 डब्बे की टेन या 58 वैगन की मालगाड़ियों को लुढ़कने से रोकने के लिए भी उसी जंजीर का इस्तेमाल हो रहा है, जबकि अगर ट्रेन लुढ़क गई तो जंजीर उसे रोक नहीं पाएगी।




रजिस्टर में किया जाता है दर्ज: यात्री टेन हो या आधा किलोमीटर लंबी मालगाड़ी। स्टेशन अधीक्षक या स्टेशन मास्टर की निगरानी में पोर्टर किसी एक पहिए को जंजीर से पटरियों से बांधकर ताला लगाता है। इसे स्टेशन मास्टर के पास रजिस्टर में दर्ज भी करनी पड़ती है।

रवानगी से पहले खुल जाता है ताला : जब ट्रेन या मालगाड़ी के खुलने का वक्त होता है, तो चालक और गार्ड के आने से पहले ताला खोल दिए जाते हैं।