विश्व में भारतीय रेल की अपनी एक अलग पहचान है, लेकिन कुछ मामले ऐसे भी है, जो इसकी शान में बट्टा लगा रहे हैं। प्रोन्नति व स्थायित्व के मामले ही लेते हैं। सरकारी संस्थान हो या निजी, समय के साथ हर कर्मचारी आगे बढ़ता है और उसके वेतन में भी वृद्धि होती है, लेकिन रेलवे में यह सब उल्टा है। यहां जिंदगी भर सेवा देने के बाद अफसर पद से सेवानिवृत कर्मचारी को चतुर्थ श्रेणी में धकेल दिया जाता है। राजेंद्र प्रसाद को ही ले लीजिये। स्टेशन अधीक्षक से रिटायर्ड हुए और विभाग उन्हें गेट कीपर मान रहा है।








ऐसे नहीं है कि रेलवे में इस तरह की कोई व्यवस्था है। यह स्थिति विभागीय अफसरों की उदासीनता के कारण खड़ी हुई है। मामला छानबीन परीक्षा या स्क्रीनिंग टेस्ट से जुड़ा है। विभागीय उदासीनता के चलते दर्जनों रिटायर्ड रेलकर्मियों के जीवन भर की गाढ़ी कमाई फंसी हुई है। इन रेल कर्मियों में से अधिकतर विभाग का चक्कर लगा रहे हैं।

गोरखपुर में तैनात राम किशुन पांडेय की पदोन्नति पर भी रेलवे ने छानबीन परीक्षा का अड़ंगा लगा दिया। वह भी कोर्ट गए तो न्याय मिला। लड़ाई जारी है। राजेंद्र प्रसाद वर्ष 2013 में उनौला से स्टेशन अधीक्षक पद से रिटायर हुए। रिटायरमेंट के समय इनका ग्रेड पे 4800 था। रेलवे प्रशासन ने अब उन्हें गेटकीपर बना दिया है। इनका ग्रेड पे संशोधित कर 1900 हो गया है।




पूर्वोत्तर रेलवे के भटनी स्टेशन पर तैनात गैंगमैन रामरूप 40 वर्ष तक रेलवे की सेवा की। वर्ष 2017 में रिटायर हुए तो रेलवे ने उन्हें अपना मानने से इन्कार कर दिया। रेलवे का कहना है कि उनकी छानबीन परीक्षा नहीं हुई है। अब रामरूप पेंशन और अन्य भुगतान के लिए कार्मिक विभाग का चक्कर लगा रहे हैं।




प्रकरण दो

मुख्यालय गोरखपुर में तैनात अरुण झा टीएमसी विभाग में तैनात हैं। ग्रेड वन में पदोन्नति के समय रेलवे प्रशासन ने रोक लगा दी। रेलवे का कहना है कि इनकी पदोन्नति नहीं हो सकती, क्योंकि इनकी छानबीन परीक्षा नहीं हुई है। बार-बार परीक्षा के लिए बुलाए जाने पर अरुण न्यायालय की शरण में गए हैं। कोर्ट ने अरुण को पदोन्नति देने का आदेश दिया।