अंतरिम बजट में सरकारी कर्मचारियों के साथ-साथ निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा की कोई न कोई सौगात आने की संभावना है।

जहां सरकारी कर्मचारी पुरानी पेंशन स्कीम बहाल होने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। वहीं निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को ईपीएस स्कीम के तहत न्यूनतम पेंशन बढ़ाए जाने का इंतजार है। सभी का मानना है कि चुनावी दबाव में सरकार इन मोर्चो पर कुछ न कुछ कर सकती है। हालांकि इसे लेकर ट्रेड यूनियनों में अलग-अलग राय है।








रेलवे की यूनियनों ने पीयूष गोयल पर पुरानी पेंशन स्कीम को बहाल करने का दबाव बनाया हुआ है। जबकि अन्य यूनियनों का जोर निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को न्यूनतम 5 हजार रुपये की पेंशन दिए जाने पर है। अभी कर्मचारी भविष्य निधि से जुड़ी ईपीएस स्कीम के तहत निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को न्यूनतम एक हजार रुपये की पेंशन का प्रावधान है। यूनियनों ने इसे नाकाफी मानते हुए सरकार से इसे 7 या 5 हजार रुपये करने का अनुरोध किया है। इस संबंध में आरएसएस से जुड़ी ट्रेड यूनियन भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) भी वाम यूनियनों के साथ है।




बीएमएस के महासचिव विरजेश उपाध्याय का कहना है कि वे सामाजिक सुरक्षा के मामले में सरकारी और निजी क्षेत्र के बीच संतुलन स्थापित करने के पक्ष में हैं। जिसमें असंगठित क्षेत्र पर विशेष ध्यान होना चाहिए। ऐसा न हो कि सरकारी कर्मचारी को तो 50 हजार रुपये पेंशन मिले और निजी क्षेत्र के कर्मचारी को 5 हजार रुपये के भी लाले पड़ जाएं।

रेलवे की प्रमुख यूनियन आल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन (एआइआरएफ) के महासचिव शिवगोपाल मिश्रा ने कहा कि सरकारी कर्मचारी निराश हैं। उन्हें सातवें वेतन आयोग से भी कुछ नहीं मिला है। न्यूनतम वेतन को 18 हजार से 21 हजार करने का वादा भी पूरा नहीं हुआ है। पुरानी पेंशन स्कीम की बहाली होना तो दूर की बात है। हमने अपनी मांगें सरकार के सामने रख दी हैं। आंदोलन भी कर रहे हैं। चुनाव के नाम पर ही सही सरकार कुछ तो करे। हमें एनपीएस स्वीकार नहीं है।




पुरानी पेंशन में कर्मचारी को मूल वेतन के 50 प्रतिशत के बराबर पेंशन मिलती थी। जबकि एनपीएस में पेंशन इससे बहुत कम है। जबकि एनपीएस में 10 प्रतिशत मूल वेतन कटता है जिसमें इतना ही अंशदान मिलाकर प्रतिभूतियों में निवेश किया जाता है। इससे कितनी पेंशन बनेगी यह अनिश्चित है।

कर्मचारियों की नाराजगी को देखते हुए सरकार ने तीन राज्यों में चुनाव से पहले दिसंबर में एनपीएस के अंतर्गत अपना योगदान 10 फीसद से बढ़ाकर 14 प्रतिशत करने का एलान किया था, जिसे वित्त विधेयक में प्रावधान के बाद अप्रैल से लागू होना था। लेकिन इससे कर्मचारियों में कोई उत्साह नहीं जगा है। इसलिए इसमें संशोधन संभव है।