सरकारी कर्मचारियों के बीच पुरानी पेंशन स्कीम की बहाली जोर पकड़ रही है। सरकारी कर्मचारी जहां समय की नजाकत को समझते हुए पुरानी पेंशन बहाली के लिए केंद्र और राज्य सरकारों पर दबाव बढ़ा रहे हैं। वहीं चुनावी साल होने की वजह से अब यह चुनावी मुद्दा भी बन रहा है। कई राजनीतिक पार्टियों ने इसे चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करने की बात कही है। इस वजह से सवाल हो रहा है कि क्या केंद्र और राज्य सरकारें बाधाओं को दूर करते हुए अपने कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन स्कीम बहाल कर पाएंगी/







सैलरी और पेंशन खर्च का फर्क

ईपीएफओ के सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टी के सदस्य नागेश्वर राव का कहना है कि चुनावी माहौल में कोई कुछ भी कह दे, मगर पुरानी पेंशन स्कीम को लागू करना काफी मुश्किल है। पुरानी पेंशन स्कीम में कर्मचारी का कोई कंट्रिब्यूशन नहीं था। कर्मचारी जब रिटायर होता है तो उसको अंतिम बेसिक सैलरी की 50 फीसदी रकम ताउम्र पेंशन के तौर पर मिलती है। यही नहीं, उसके मरने पर पत्नी को मिलती है। वहीं नई पेंशन स्कीम यानी नैशनल पेंशन स्कीम में फैमिली पेंशन नहीं है। इसमें सरकार और कर्मचारी दोनों का कंट्रिब्यूशन है। पेंशन भी तय नहीं है।




पेंशन फंड के इनवेस्टमेंट से जो रिटर्न मिलता है, उसके आधार पर पेंशन तय होती है। इसके बावजूद साल 2018-19 के अनुमानित आंकड़ों के अनुसार सरकारी कर्मचारियों की सैलरी का कुल खर्चा 3.23 लाख करोड़ रुपये है तो पेंशन पर सरकारी खर्च 2.77 लाख करोड़ रुपये अनुमानित है। नई पेंशन स्कीम तभी लागू हो सकती है, जब केंद्र या राज्य सरकार के पास इतना अधिक पैसा हो कि वह इसका भार उठाने में सक्षम हो।




सैलरी के साथ पेंशन भी बढ़ गई 

सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों से सरकारी कर्मचारियों का वेतन बढ़ा है और उस हिसाब से पेंशन में भी बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा सरकार ने नई पेंशन स्कीम में अपना कंट्रिब्यूशन भी बढ़ाकर 14% कर दिया है। मतलब कि नई पेंशन स्कीम में सरकार का कंट्रिब्यूशन बेसिक सैलरी का 14% हो गया है, वहीं कर्मचारी का कंट्रिब्यूशन 10% रहेगा। ऐसे में सरकार का पेंशन में कंट्रिब्यूशन बढ़ा है। यही वजह है कि सरकार का पेंशन बिल बढ़ रहा है।