सेवानिवृत्ति के बाद नहीं रोकी जा सकती पेंशन

नौकरी के दौरान सेना से बाहर सजा पाए सैनिकों की पेंशन रिटायरमेंट के बाद नहीं रोकी जा सकती। आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल ने एक सैनिक की इस आधार पर रोकी गई पेंशन को जारी करने का आदेश दिया है। सेना ने छुट्टी के दौरान गांव में हुए विवाद में गैर इरादतन हत्या के आरोप में जेल गए अपने एक सैनिक की पेंशन को उसकी सजा के आधार पर देने से मना कर दिया था।







सतेन्द्र पाल सिंह 26 दिसंबर 1986 में सेना में सिपाही के रूप में भर्ती हुआ था। पंजाब में तैनाती के दौरान वह मई 1989 को छुट्टी पर अपने घर फर्रुखाबाद गया था। वहां विवाद में एक व्यक्ति की मौत होने पर पुलिस ने उसे गैर इरादतन हत्या के आरोप में 12 मई 1989 को जेल भेज दिया था। चार महीने बाद उसकी जमानत हो गई और उसने ड्यूटी जॉइन कर ली। इस दौरान सिपाही की ओर से हुए अपराध में उसे दोबारा सात साल की सजा सुना दी गई। उसे फिर से जेल भेज दिया गया। उसने मामले की पैरवी की तो उसे 1996 जमानत मिल गई और वह फिर से ड्यूटी पर चला गया। इसके बाद सिपाही सतेन्द्र पाल सिंह ने 2004 तक सेना में नौकरी करने के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली, लेकिन सेना सजा का हवाला देते हुए उसे पेंशन देने से मना कर दिया। पेंशन की मांग करते हुए सिपाही की ओर से सेना को 2006 में लीगल नोटिस भेजा गया। इसके बाद सेना ने सिपाही को अस्थायी पेंशन जारी कर दी।








2010 में दोबारा हुई सजा

सिपाही को सात साल की सजा हुई थी, लिहाजा उसे 2010 में दोबारा जेल जाना पड़ा। वह 2012 तक जेल में रहा। रिहा होकर सैनिक ने सेना को पत्र भेज कर सेवानिवृत्ति से जुड़े सभी लाभ और पेंशन जारी करने की मांग की, लेकिन सेना ने सजा का हवाला देते हुए उसको पेंशन देने से इनकार कर दिया। इसके बाद सैनिक ने एएफटी का दरवाजा खटखटाया। सैनिक के अधिवक्ता रहे पीके शुक्ला ने तर्क दिया कि सैनिक ने सेवानिवृत्ति के बाद कोई भी अपराध नहीं किया है और उसे पूर्व में किए गए अपराध के कारण ही जेल जाना पड़ा है। लिहाजा सैनिक को पूरी पेंशन दी जाए। जिस पर सेना कोर्ट ने कहा कि सेना को सेना अधिनियम धारा 25 के तहत सैनिक की सैलरी में कटौती का अधिकार नहीं है, इसलिए सेना कोर्ट ने भारतीय सेना को 6 महीने के अंदर उसकी पूरी पेंशन बहाल करने का आदेश सुनाया है।