रेलवे की एक गलती सालों से नौकरी कर रहे युवकों पर भारी पड़ रही है। मामला जुड़ा है रेलवे की वर्कशॉप सहित अन्य कार्यालयों में बतौर तकनीकी कर्मचारियों का। रेलवे ने एक्ट अप्रेंटिस के तहत 2004 में 370 सब्सटिट्यूट पदों के लिए भर्ती निकाली और 324 युवकों का चयन किया। लेकिन रेलवे ने उन 14 युवकों को नहीं लिया जिन्होंने रोडवेज से ट्रेनिंग की थी।








रेलवे ने उन्हें यह कहकर नौकरी नहीं दी कि केवल रेलवे से ट्रेंड युवक ही नौकरी के लिए योग्य हैं। इस पर इन 14 युवकों ने कोर्ट का सहारा लिया। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा कि भर्ती ही गलत है और इसमें चयनित सभी कर्मचारियों को हटाया जाए। रेलवे ने 370 कर्मचारियों को नोटिस भेजा है। रेलवे ने 13 साल भर्ती तो कर ली। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उन्हें हटाया जा रहा है। ऐसे में ये युवक अन्य नौकरियों के लिए भी अपात्र हो गए हैं, क्योंकि इनकी उम्र 40 वर्ष से अधिक तक हो चुकी है।




इनमें ऑन ड्यूटी 15 की मौत हो गई है और मशीनों से तीन कर्मचारी दिव्यांग हो गए हैं।
सबसे ज्यादा जोधपुर मंडल में होंगे नौकरी से बाहर : पिछले 13 साल में 370 में से कुछ एक्ट अप्रेंटिस की मृत्यु हो गई। तो कुछ स्वतः: नौकरी छोड़ चले गए। अब जिन्हें हटाया जा रहा है, उनमें सर्वाधिक जोधपुर मंडल में कार्यरत हैं। उत्तर-पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक की ओर से जारी आदेश के अनुसार जोधपुर मंडल के 88, वर्कशॉप के 48, अजमेर मंडल के 58, वर्कशॉप के 27, बीकानेर मंडल के 42 और जयपुर मंडल के 31 कर्मचारियों को हटाने को कहा गया है।




13 साल पहले रेलवे ने की थी नियुक्ति
रोडवेज से एक्ट अप्रेंटिस की ट्रेनिंग लेने वाले 14 युवकों की एक आपत्ति के बाद भी रेलवे ने यह कह कर इन्हें खारिज कर दिया कि रोडवेज अलग है, रेलवे अलग। इसके बाद युवकों ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण की जोधपुर पीठ में चुनौती दी। वर्ष 2004 में सुनवाई शुरू हुई और रेलवे के तर्क को अधिकरण ने खारिज कर दिया। रेलवे इसके खिलाफ हाईकोर्ट गई। तत्कालीन जस्टिस भगवती प्रसाद शर्मा ने भी रेलवे के पक्ष को खारिज करते हुए अधिकरण के निर्णय को सही ठहराते हुए 324 कर्मचारियों को हटाने का आदेश दिया था। जब अगस्त 2008 में रेलवे ने 324 कर्मचारियों को हटाने का आदेश जारी किया। तो रेलवे के इन आदेशों के खिलाफ पीड़ित 324 कर्मचारी सितंबर 2008 में सुप्रीम कोर्ट गए।