खतौली रेलवे स्टेशन से शनिवार की सायं पौने छह बजे निकली कलिंग उत्कल एक्सप्रेस की दुर्घटना के लिए रेलवे के गैंग नंबर 16 के सभी कर्मचारी फरार हैं। खुफिया विभाग से लेकर जीआरपी और आरपीएफ इस गैंग में शामिल रेलकर्मियों के नामों की सूची मांग रहे हैं। खतौली में कार्यरत रेल पथ निरीक्षक (जेई) प्रदीप कुमार के निर्देशन में यही गैंग नंबर 16 जगत कालोनी और शिवपुरी के बीच से निकल रही रेल लाइन पर काम कर रहा था। बताया जाता है कि ब्लॉक नहीं मिलने पर गैंग नंबर 16 के कर्मियों ने ही बिना अनुमति लाइनों से छेड़छाड़ कर एक टुकड़ा अलग कर दिया। ब्लॉक नही मिलने पर बिना कॉशन के कलिंग उत्कल एक्सप्रेस तेज गति से आ गई तो गैंग नंबर 16 के कर्मी अपने औजार छोड़कर भाग खड़े हुए। उन्हें पहले से ही आशंका थी कि ट्रेन क्षतिगस्त होगी इसलिए वह लाइनों से इतनी दूर चले गए।








मुजफ्फरनगर के पास खतौली स्टेशन पर उत्कल एक्सप्रेस हादसे के बाद उत्तर रेलवे (एनआर) के जीएम को छुट्टी पर भेज दिया गया। उनका कार्यभार उत्तर मध्य रेलवे (एनसीआर) के जीएम एमसी चौहान को सौंपा गया है। एमसी चौहान अब दोनों जोन का परिचालन कार्य और अन्य प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन करेंगे।




‘चलता है’ के रवैये से हो रहे हादसे

आधुनिक तकनीक और संरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन करने ट्रेनों के पटरी से उतरने की घटनाएं रुकेंगी। संरक्षा से समझौते के कारण ही उत्तर प्रदेश के खतौली में उत्कल एक्सप्रेस के पटरी से उतरने की घटना हुई। यदि इंजीनियरिंग विभाग को ट्रैक मरम्मत के लिए ब्लाक नहीं मिला तो कार्य स्थल से 1200 मीटर दूरी पर लाल झंडी व बोर्ड लगाकर काम पूरा कर सकते थे। लेकिन ‘चलता है’ की प्रवृत्ति से पिछले तीन सालों से ट्रेनों के पटरी से उतरने की घटनाएं बढ़ गई हैं। 2015-16 में 48 ट्रेन बेपटरी हुईं और 2016-17 में इनकी संख्या बढ़कर 78 हो गई। गंभीर बात यह है कि हादसों में मृतकों की संख्या कई गुना बढ़ गई है।




रेलवे बोर्ड का ध्यान ट्रेनों के समयपालन पर अधिक है और रेल संरक्षा की उपेक्षा हो रही है। रेल संरक्षा के प्रति समर्पण से ही सुरक्षित ट्रेनों का परिचालन संभव है। इसका उदाहरण जापान है। तीन दशक से 330 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से बुलेट ट्रेन चलती है लेकिन आज तक हादसा नहीं हुआ। जबकि सर्वाधिक भूकंप जापान में आते हैं। रेलवे ट्रैक जर्जर हो गए हैं। वर्तमान में एक डंडी में मीटर लगाकर ट्रैक के फ्रैक्चर खोजे जाते हैं। आधुनिक तकनीक अल्ट्रा सोनिक फॉल्ट डिटेकशन तकनीक को ट्रेन के कोच, वैगन, इंजन में लगाकर इस काम को सटीकता से किया जा सकता है। ट्रैक मरम्मत कार्य किसी भी हाल में ठेकेदारी प्रथा से नहीं कराना चाहिए।

विभागीय कर्मचारी मरम्मत कार्य में दक्ष होते हैं। दशकों पुराने कोच हादसा होने पर एक दूसरे पर चढ़ जाते हैं। जबकि जर्मन तकनीक वाले एलएचबी कोच दुर्घटना होने पर चढ़ते नहीं है। इससे हादसा होने पर भी यात्री घायल होंगे, लेकिन उनकी जिंदगी बचाई जा सकती है।टक्कर रोधी तकनीक (टीकैश) का काफी समय से ट्रॉयल चल रहा है। ट्रेनों में इस तकनीक को जल्द लगाना चाहिए। सात साल के लंबे अंतराल के बाद एक लाख करोड़ रुपये स्पेशल रेल सेफ्टी फंड मिला है। इस पैसे को सिर्फ रेलवे ट्रैक, सिग्नल सिस्टम, पुल, कोच निर्माण पर ही नहीं खर्च किया जाना चाहिए। 20 हजार ट्रेनों को चलाने वाले 8 लाख कर्मचारियों के प्रशिक्षण-क्षमता वृद्धि पर खर्च होना चाहिए। संरक्षा कर्मी बेहद तनाव से गुजरते हैं। इस दिशा में काम करने की जरूरत है।

16 no. gang