अब रेलकर्मी देश में कहीं भी कैशलेस इलाज करा सकेंगे। रेलवे का मेडिकल विभाग सभी रेलकर्मियों का सीटीएसई (कैशलेस ट्रीटमेंट स्कीम इन इमरजेंसी) कार्ड बनाएगा। यह कार्ड आधार से लिंक होगा। पूर्वोत्तर रेलवे ने इस सुविधा को शुरू कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

रेलवे अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों और आधुनिक उपकरणों की कमी के चलते रेलकर्मियों को गंभीर बीमारी का इलाज निजी अस्पतालों में कराना पड़ता है। अभी पूर्वोत्तर रेलवे ने पीजीआई लखनऊ से करार किया है, मगर इसके लिए रेलकर्मियों को रेलवे अस्पताल से रेफर कराना पड़ता है।

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इन समस्याओं को दूर करने के लिए नई व्यवस्था लागू की गई है। इसके तहत देश के सभी जिलों में कैशलेस इलाज की सुविधा मिलेगी और रेलकर्मियों को अस्पताल से रेफर कराने की जरूरत नहीं होगी।

ओपीडी के अलावा इमरजेंसी में सीधे भर्ती कराने की सुविधा मिलेगी। इसके लिए मेडिकल विभाग देश के सभी जोन में निजी अस्पताल से करार कर रहा है। सीटीएसई कार्ड को आधार नंबर से लिंक कराने के बाद रेलकर्मी का पूरा ब्यौरा अस्पताल में उपलब्ध हो जाएगा। इलाज का भुगतान बाद में रेलवे करेगा।

एनईआर में हैं 54 हजार रेलकर्मी  








पूर्वोत्तर रेलवे में 54 हजार रेलकर्मी कार्यरत हैं और करीब 40 हजार सेवानिवृत्त रेलकर्मी हैं। कैशलेस इलाज का लाभ रेलकर्मियों के साथ ही इनके परिवार के लोगों को भी मिलेगा।

”पूरे देश में कैशलेस इलाज को लेकर प्रक्रिया चल रही है। इसके तहत रेलकर्मी को अस्पताल से रेफर कराने की जरूरत नहीं होगी। रेलकर्मियों के आधार नंबर और उनका ब्यौरा तैयार कराया जा रहा है। जल्द ही यह सुविधा मिलने लगेगी।”

रेलवे देशभर में संचालित रेलवे अस्पतालों, स्वास्थ्य केन्द्र और पॉली क्लीनिक को बंद करने की तैयारी में है। इसे लेकर समय-समय पर लगातार बोर्ड स्तर पर अधिकारियों की बैठक हो रही है। रेलवे इन अस्पतालों को बंद करने के बाद निजी अस्पतालों से अनुबंध करेगा। रेलवे अस्पतालों को बंद करने की सुगबुगाहट शुरू होने के साथ ही रेलवे कर्मचारी यूनियन इस निर्णय के विरोध में उतर आए हैं।

रेलवे कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि अगर रेलवे अस्पताल बंद होते हैं तो इसका सबसे ज्यादा असर निचले स्तर के कर्मचारियों पर ही पड़ेगा। भले ही रेलवे निजि अस्पतालों से अनुबंध कर ले, लेकिन रेल प्रशासन की लापरवाही के चलते उन्हें समय पर इलाज नहीं मिलता।

रेलवे अस्पताल चल रहे हैं तो कम से कम मुफ्त दवा व छोटी-छोटी बीमारियों का इलाज तो हो जाता है। अगर ये भी बंद हो जाते हैं तो एक तरह से यह सुविधा भी छिन जाएगी। अलग-अलग कर्मचारी संगठन अभी से इसके विरोध की तैयारी में जुट गए हैं।

विवेक देबरॉय समिति ने की थी सिफारिश




रेलवे अस्पतालों को बंद करने की सिफारिश विवेक देबरॉय समिति द्वारा की गई थी। सूत्रों की मानें तो इस सिफारिश को मंजूर करने की तैयारी रेलवे ने कर ली है, लेकिन कर्मचारियों के विरोध के चलते अभी इसकी घोषणा नहीं की गई है।

समिति द्वारा तर्क दिया गया था कि रेलवे अस्पतालों के बाद भी कई जगह निजी अस्पतालों से अनुबंध किया गया है। इस वजह से रेलवे अस्पतालों पर भी खर्चा हो रहा है और निजी अस्पतालों को भी पैसा जा रहा है। रेलवे अस्पतालों को बंद करने से इन पर होने वाला खर्च बचेगा।

ये समस्या आएगी

एक रेलवे अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि रेलवे अस्पताल संचालित जरूर हो रहे हैं, लेकिन अगर जोनल और डिवीजनल स्तर के अस्पतालों को छोड़ दिया जाए तो स्वास्थ्य केन्द्र, पॉली क्लीनिक सिर्फ नाम के ही हैं। यहां सुविधाएं तो हैं, लेकिन उचित देखरेख के चलते कर्मचारियों को इनका लाभ ही नहीं मिल रहा। इस वजह से अभी भी कई जगह निजी अस्पतालों से अनुबंध हैं।




वहीं निजी अस्पतालों से अनुबंध तो हो जाता है, लेकिन समय पर भुगतान न होने के चलते या अस्पतालों द्वारा लापरवाही के चलते यह अनुबंध सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाता है। इसलिए अगर रेलवे अस्पतालों को बंद कर निजी अस्पतालों से अनुबंध करता है, तब भी परेशानी होगी।

ग्वालियर में रेलवे की पॉली क्लीनिक है, लेकिन यह नाममात्र की है। रेलवे ने बिड़ला हॉस्पिटल से अनुबंध किया था, लेकिन अनुबंध होने के बाद भी वहां कर्मचारियों को इलाज नहीं मिलता। इसका कारण है कि रेलवे द्वारा हॉस्पिटल का भुगतान नहीं किया गया है। ऐसी स्थिति में अभी भी कर्मचारी अपने पैसे खर्च कर इलाज करवा रहे हैं। यही स्थिति वहां भी है, जहां निजी अस्पतालों से अनुबंध है।

रेलवे अस्पतालों, स्टाफ पर होने वाला खर्च बचेगा

रेलवे अधिकारियों का तर्क है कि रेलवे अस्पतालों में अधिकांश स्टाफ संविदा पर है। अस्पताल बंद होने से इनके वेतन, भत्तों पर होने वाला खर्च बचेगा। हर वर्ष अस्पतालों पर होने वाला खर्च भी बचेगा। दूसरी तरफ निजी अस्पतालों से अभी भी अनुबंध है और वहां भी पैसा खर्च होता है। वर्तमान में रेलवे के अस्पतालों में 50 हजार से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं।

रेलवे अस्पतालों को बंद करने की तैयारी चल रही है। यह कर्मचारियों से एक बड़ी सुविधा छीनने की तैयारी है। निजी अस्पतालों से अनुबंध हो तो जाता है, लेकिन कागजों तक ही सीमित रह जाता है। ग्वालियर की ही बात करें तो यहां कर्मचारियों को जेब से इलाज करवाना पड़ता है। जिस अस्पताल से अनुबंध है, उसका भी भुगतान नहीं हुआ है। हम इसका विरोध करेंगे। – सुभाष उपाध्याय, सचिव, नॉर्थ सेन्ट्रल रेलवे मेंस यूनियन

इस निर्णय का हम विरोध करेंगे। जब तक इसका उचित विकल्प नहीं दिया जाएगा, हम ऐसा नहीं होने देंगे। – जेके चौबे, मंडल उपाध्यक्ष, नॉर्थ सेन्ट्रल रेलवे एम्पलॉइज संघ

विवेक देबरॉय समिति ने अपनी रिपोर्ट में इसके लिण् सुझाव दिया था। अभी इस पर निर्णय होना बाकी है। इस पर विचार चल रहा है। – अनिल कुमार सक्सेना, अपर महानिदेशक, रेलवे बोर्ड (जनसम्पर्क)