रेलवे के निजीकरण का प्रस्ताव: किसका फायदा और क्या-क्या दांव पर

| July 10, 2020

अभी देश में 13 हजार ट्रेनें चल रहीं हैं और मांग एवं आपूर्ति के बीच समानता लाने करने के लिए सात हजार ट्रेनें और चलाई जाएंगी। अभी इन ट्रेनों का संचालन और प्रबंधन भारतीय रेल ही करता है। अब प्रबंधन के काम में निजी क्षेत्र कूदेगा। 151 रेलगाड़ियों के बारे में रेलवे ने कहा है कि वह 35 साल के लिए ये परियोजनाएं निजी कंपनियों को देगा।

भारतीय रेल 151 रेलगाड़ियों का परिचालन निजी क्षेत्र के हवाले करने जा रहा है। क्या इसे रेलवे का निजीकरण कहा जा सकता है? चार महीने पहले जब नीति आयोग ने इसकी सिफारिश की थी तो रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि रेलवे का निजीकरण नहीं होने जा रहा है, बस उसकी कुछ सेवाओं को निजी क्षेत्र के हवाले (आउटसोर्स) किया जाएगा। रेलवे बोर्ड के चेयरमैन का कहना है कि अप्रैल 2023 में निजी रेल सेवाएं शुरू हो जाएंगी और ये भारत के रेलवे नेटवर्क पर यात्री ट्रेनों के संचालन में निजी क्षेत्र के निवेश का पहला प्रयास है। जाहिर है, इसके बाद रेलवे की जमीन और अन्य परिसंपत्तियां भी निजी क्षेत्र को सौंपने की कवायद की जाएगी। यह सुझाव नीति आयोग भी दे चुका है।

गुणवत्ता और जरूरत भारतीय रेलवे 67,415 किमी के मार्ग की लंबाई के साथ आकार में दुनिया के चौथे सबसे बड़े रेलवे नेटवर्क का प्रबंधन करता है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय रेलवे को अगले 12 साल के लिए 50 लाख करोड़ रुपए की जरूरत होगी, जबकि सरकार के पास इतना रुपया केवल इस सेक्टर पर खर्च करने के लिए नहीं है। भारतीय रेलवे को केंद्र सरकार सार्वजनिक कल्याण के लिए चलाती है ना कि लाभ कमाने के उद्देश्य से। भारत में रेल किसी व्यावसायिक संगठन की तरह नहीं, एक सार्वजनिक सेवा की तरह चलती रही है। सब्सिडी के जरिए सस्ती यात्रा की व्यवस्था हमेशा से भारतीय रेलवे की पहचान रही है।

इसका नुकसान यह हुआ है कि रेलवे की गुणवत्ता पर कभी बहुत ज्यादा ध्यान देने की जरूरत भी नहीं समझी गई। जबकि, इसका बड़ा फायदा यह हुआ कि इसने बड़े पैमाने पर श्रमिकों के आवागमन को सहज और सुलभ बनाया। खासकर उन कृषि मजदूरों के मामले में जो हर साल धान की रोपाई और फसल की कटाई के मौसम में बड़ी संख्या में पंजाब जैसे राज्यों का रुख करते हैं। अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के मामले में रेलवे के इस योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

निजीकरण का शुरुआती कदम
अभी देश में 13 हजार ट्रेनें चल रहीं हैं और मांग एवं आपूर्ति के बीच समानता लाने करने के लिए सात हजार ट्रेनें और चलाई जाएंगी। अभी इन ट्रेनों का संचालन और प्रबंधन भारतीय रेल ही करता है। अब प्रबंधन के काम में निजी क्षेत्र कूदेगा। 151 रेलगाड़ियों के बारे में रेलवे ने कहा है कि वह 35 साल के लिए ये परियोजनाएं निजी कंपनियों को देगा। हालांकि, इन सभी ट्रेनों में ड्राइवर और गार्ड भारतीय रेलवे के होंगे।

निजी कंपनियां, भारतीय रेलवे को पारदर्शी राजस्व प्रक्रिया के माध्यम से निर्धारित सकल राजस्व में हिस्सेदारी का भुगतान निर्धारित ढुलाई शुल्क, वास्तविक खपत के अनुसार ऊर्जा शुल्क के रूप में करेंगी। इस निजीकरण के पीछे भारतीय रेलवे का उद्देश्य रेलवे को लेट-लतीफी से छुटकारा दिलाना, यात्रियों की सुरक्षा बढ़ाना, यात्रियों को विश्वस्तरीय यात्रा का अनुभव प्रदान करना और सभी यात्रियों को कंफर्म टिकट उपलब्ध कराना है।

तेजस का अनुभव कितना कारगर
जब रेलवे के निजीकरण की बात आती है तो अक्सर तेजस ट्रेनों का उदाहरण दिया जाता है। तेजस का परिचालन इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टिकटिंग कारपोरेशन यानी आइआरसीटीसी कर रही है, जो भारतीय रेलवे की ही एक सहायक कंपनी है। इस कंपनी को भारतीय रेलवे नेटवर्क की सबसे पेशेवर आधुनिक इकाइयों में गिना जाता है। ऑनलाइन टिकट बिक्री के मामले में यह काफी कामयाब रही है, जबकि खान-पान सेवा को लेकर लगातार आलोचना होती रही है।

तेजस एक्सप्रेस ट्रेनों को निजी परिचालन का अच्छा उदाहरण इसलिए भी नहीं माना जा सकता कि इसके लिए जो प्रक्रिया अपनाई गई उसे वाजिब नहीं कहा जा सकता। न तो निविदाएं आमंत्रित की गईं, न कोई बोली लगी। रेलवे ने अपनी एक नई प्रीमियम ट्रेन का परिचालन सीधे तौर पर अपनी ही एक सहायक कंपनी को सौंप दिया। यह कहा जा सकता है कि तेजस के मामले में रेलवे ने जो किया वह ट्रेन को बाहरी हाथों में सौंपने का एक आधा-अधूरा सा प्रयोग था।

नुकसान और फायदा
रेलवे के निजीकरण से सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे बड़ी संख्या में सरकारी नौकरियां खत्म होंगी। 151 ट्रेनों के एलान के बाद रेलवे ने सभी मंडल रेल प्रबंधकों को पत्र जारी कर कहा है कि उन कर्मचारियों की सूची तैयार करें, जो 2020 की पहली तिमाही में 55 साल के हो गए या जिनकी सेवा अवधि के 30 साल पूरे हो गए। उन सभी को समय-पूर्व सेवानिवृत्ति का ऑफर दिया जाएगा। इनकी संख्या पूरे रेलवे में कम से कम तीन लाख बताई जा रही है।

निजीकरण होने पर निजी ट्रेनों को क्लियर सिग्नल मिलने और सरकारी ट्रेनों की लेट-लतीफी बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। ज्यादा असर रेलवे के किरायों की बढ़ोतरी के रूप में होगा। हालांकि, रेलवे का तर्क है कि इस परियोजना से रेलवे में नई तकनीक आएगी, मरम्मत का खर्च घटेगा, यात्रा का समय कम होगा, नौकरियां बढ़ेंगी, सुरक्षा बढ़ेगी और यात्रियों को विश्व स्तरीय सुविधाएं मिलेंगी।

क्या कहते हैं जानकार ट्रेनों का निजीकरण करना आसान है, लेकिन किसके हित के लिए? निजीकरण रेलवे की दुर्दशा का रामबाण इलाज नहीं है, बल्कि रेलवे की अक्षमता ही है। जब देश पहले से ही गंभीर वित्तीय संकट से गुजर रहा हो, ट्रेनों का निजीकरण करना लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा ही है।
– अधीर रंजन चौधरी, पूर्व रेल राज्य मंत्री और कांग्रेस सांसद

यह न सिर्फ रेलवे कर्मचारियों, बल्कि यात्रियों की जेब पर भी वार है। ट्रेन के किराए में 43 फीसद सब्सिडी यात्रियों को मिलती है। निजी कंपनियां ये रियायत यात्रियों को नहीं देंगी। रेलवे में खान-पान तो पहले से ही आइआरसीटीसी के हाथ में है। यह रेलवे की निजी कंपनी ही है, क्या खान-पान से लोग संतुष्ट हैं?
– तपन सेन, सीटू महासचिव

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