रेलवे के अधिकारीयों की लापरवाही – 17 घंटे बाढ़ में फंसे रहे यात्री

| July 28, 2019

रेलवे की लापरवाही के कारण मुंबई से कोल्हापुर जा रही महालक्ष्मी एक्सप्रेस 17 घंटे पानी में फंसी रही। मुंबई-कोल्हापुर रूट पर अप और डाउन लोकल ट्रेनें भी पानी में फंसी इसके बावजूद रेलवे ने एक हजार से अधिक यात्रियों से भारी महालक्ष्मी ट्रेन को गंतव्य के लिए रवाना कर दिया। इस घटना ने रेलवे की मानसून पेट्रोलिंग की पोल भी खोल दी है।.








रेलवे के विशेषज्ञों ने बताया कि मानसून से पहले और मानसून के बाद रेलवे ट्रैक, पुल व अन्य बुनियादी ढांचे की जांच की जाती है जिससे ट्रेन को सुरक्षित चलाया जा सके और परिचालन के दौरान कोई हादसा नहीं हो। इसके अलावा रेलवे में दिन-रात मानसून पेट्रोलिंग की व्यवस्था है। पूरे मानूसन में रेलवे, स्थानीय प्रशासन व स्थानीय मौसम विभाग में तालमेल बना रहता है। मौसम विभाग जिला प्रशासन को पांच दिन पहले भारी बारिश व खराब मौसम की जानकारी देता है।.




इसके अलावा मानसून पेट्रोलिंग में सभी सेक्शन में गैंगमैन व सेक्शन इंजीनियरिंग की 24 घंटे ड्यूटी रहती है। गैंगमैन रेलवे ट्रैक का विशेषतौर पर रात में पैदल चलकर मुआयना करते हैं। इसकी रिपोर्ट सीनियर सेक्शन इंजीनियर को दी जाती है। इस व्यवस्था के बाद भी महालक्ष्मी सहित अन्य लोकल ट्रेनें मुंबई-कोल्हापुर सेक्श्न पर फंस गई। इसमें रेल यात्री भूखे-प्यासे करीब 17 घंटे तक कोच में कैद रहे। .




छह फीट तक पानी में फंसे : बाढ़ में फंस जाने से कुछ यात्रियों के समूह ने बदलापुर स्टेशन के लिए पैदल यात्रा शुरू कर दी थी, पर तीन से छह फीट तक बाढ़ के पानी में वह फंस गए। ग्रामीणों ने रस्सी फेंक कर उन्हें बाहर निकाला। एनडीआरएफ की टीमों ने इस समूह को बाद में सुरक्षित बाहर निकाला। .

महालक्ष्मी एक्सप्रेस जिस इलाके में फंसी थी उसके आसपास के गांव भी जलमग्न हैं। बावजूद, ग्रामीणों ने जान पर खेलकर ट्रेन में सवार यात्रियों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने में भरपूर मदद की। ट्रेन में सवार एक लड़की ने बताया कि अगर गांव वाले नहीं होते तो हमारी जिंदगी नहीं बच पाती।.

कई यात्रियों ने आपबीती सुनाई। एक लड़की ने बताया, मध्य रेलवे दो तीन घंटे तक यही बोलता रहा इंजन आ रहा है। हालांकि, रेलवे ने मदद पहुंचाने में देर कर दी। कई आपातकालीन नंबरों पर भी संपर्क किया, लेकिन मदद नहीं मिली। बुजुर्गों को चलने में दिक्कत आ रही थी। ऐसे में आसपास के ग्रामीणों ने मदद की। गांव वाले नहीं होते, हमारी मदद नहीं होती। इसलिए गांव वालों धन्यवाद। .

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