Railway is worried about the health of its employees

| March 1, 2019

गंभीर बीमारियों की जद में आ रहे कर्मचारी रेलवे के लिए चुनौती बनते जा रहे। इससे कामकाज में खलल पड़ने, व्यवस्था बेपटरी होने से बचाने की चुनौती है ही उनके स्थान पर नई भर्ती भी बड़ी समस्या है। मंडलीय रेल चिकित्सालय से मिले आंकड़ों के अनुसार मुगलसराय रेल मंडल में औसतन 15 कर्मचारी हर साल अनफिट घोषित हो रहे, जबकि 20 डी-कैटराइज्ड कर दिए जाते हैं। 2018 महकमे के लिए बीमारियों वाला वर्ष रहा। 19 कर्मचारी जहां अनफिट हुए वहीं 24 डी-कैटराइज्ड की श्रेणी में आए।








अनियमित दिनचर्या, खानपान में कमी और बढ़ता तनाव। ये वजहें हैं जो रेल कर्मचारियों को बीमार बना रहीं। बीमारी भी ऐसी कि दोबारा काम पर लौटने नहीं दे रही। ऐसे कर्मचारी महकमे के लिए भी परेशानी का सबब बनते जा रहे हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो मुगलसराय रेल मंडल में तैनात कर्मचारियों की संख्या तकरीबन 10 हजार 700 है। अकेले पीडीडीयू जंक्शन से जुड़े विभागों में लगभग आठ हजार कर्मचारी विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं।




मंडलीय रेल अस्पताल के आंकड़े बताते हैं कि हर साल 15 कर्मचारी अनफिट (अनफिट फार आल कैटगरी) घोषित हो जाते हैं। वहीं 20 को आंशिक बीमारियों के चलते डी कैटराज्ड करना पड़ता है। विगत वर्ष इस अनचाहे आंकड़े में और वृद्धि दर्ज की गई। 19 अनफिट हुए तो 24 डी-कैटराइज्ड। अनफिट कर्मचारियों के स्थान पर उनके आश्रितों को नियुक्त करना भी टेढ़ी खीर से कम नहीं। कार्मिक विभाग पर 90 दिनों के भीतर सभी औपचारिकताएं पूर्ण कर नई नियुक्ति करने की जिम्मेदारी रहती है। जबकि डी-कैटराइज्ड कर्मियों में अधिकांश लोको पायलट होते हैं। इससे परिचालन व्यवस्था प्रभावित होती है। बहरहाल कर्मचारियों की बीमारी से परेशान रेल महकमा समय-समय पर मेडिकल चेकअप कैंप आदि का आयोजन भी करता रहता है। लेकिन विभाग के तमाम जतन बीमारियां के आगे बेबस साबित हो रहे हैं।




….वर्जन….

‘कर्मचारियों के बीमार होने से समस्या तो पैदा होती है। लेकिन अनफिट कर्मियों के स्थान पर 90 दिन के भीतर उनके आश्रितों की नियुक्ति योग्यता के आधार पर करा दी जाती है। प्रयास रहता है कि व्यवस्था प्रभावित न हो।’

-अजीत कुमार, वरीय मंडल कार्मिक अधिकारी।

Category: Indian Railways, News

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