रेल कर्मियों के बेटों की हुई बल्ले-बल्ले, 33 साल की उम्र तक मिलेगा पास

| January 16, 2019

अब रेल कर्मियों के बेटों को भी 33 साल तक रेलवे पास की सुविधा मिलेगी, अभी तक यह आयु सीमा 21 वर्ष तक थी। जबकि बेटियों को शादी न होने या माता-पिता पर निर्भर होने तक यह सुविधा है। इस संबंध में रेलवे बोर्ड ने सभी जोन के डीआरएम को निर्देश भेजे हैं।








रेलवे ने 22 साल बाद इस नियम में बदलाव किया है, जिससे कर्मियों के बेटे फूले नहीं समा रहे हैं। दरअसल बेटों को नौकरी के इंटरव्यू या लिखित परीक्षा का समय आता था तब तक वह रेलवे पास के दायरे से बाहर हो जाते थे। हर बार परीक्षा देने के लिए शहर से बाहर जाने के लिए खर्चा देना रेलकर्मी को भी अखरता था। रेलवे बोर्ड के सूत्रों के मुताबिक, नए नियमों में रेलवे पास नियम 1986 और 1993 के बदलाव का उल्लेख किया है। जिसमें रेलकर्मी नौकरी में हो या सेवानिवृत्त, आश्रित बेटों को सुविधा 33 साल की आयु तक मिलती रहेगी। रेलवे बोर्ड ने इस पर तत्काल प्रभाव से अमल करने का आदेश सभी मंडलों के डीआरएम को दिया है। पूर्वोत्तर रेलवे श्रमिक संघ के महामंत्री जेएस भदौरिया ने कहा कि संगठन लंबे समय से यह सुविधा दिलाने के लिए प्रयासरत था।

सीएजी रिपोर्ट : रेलवे में ठेके पर काम कर रहे मज़दूरों को लूट रहे हैं ठेकेदार

मीडिया में गढ़ी गई छवि के बरक्स अगर आप ठेके पर काम करने वाले मज़दूरों पर आई सीएजी की रिपोर्ट को देखेंगे कि तो पता चलेगा कि रेलवे बग़ैर किसी मंत्री के चल रहा है.

सीएजी ने 2014-15 से लेकर 2016-17 के बीच दिए गए 463 कांट्रेक्ट में काम करने वाले ठेके के मज़दूरों के हालात की समीक्षा की है. इस ऑडिट को पढ़कर लगता है कि रेलवे में 2014 के बाद कुछ भी नहीं बदला है. ठेकेदारों की मौज अब भी जारी है.

रेलवे ने 2016-17 में ठेके पर काम कराने के लिए 35098 करोड़ का भुगतान किया था. सीएजी का कहना है कि ठेकेदारों ने इसका 4 प्रतिशत हिस्सा यानी 1400 करोड़ से अधिक की राशि मज़दूरों के हिस्से से मार लिया. यही नहीं रेल मंत्रालय कई हज़ार करोड़ रुपये के कांट्रेक्ट देती है. उन कामों में ठेके पर रखे गए मज़दूरों को शोषण से बचाने के लिए संसद ने जितने भी कानून बनाए हैं, उनमें से किसी का भी 50 परसेंट भी पालन नहीं होता है. न तो उन्हें न्यूनतम मज़दूरी मिलती है, न ओवर टाइम मिलता है, न छुट्टी मिलती है, न छुट्टी का पैसा मिलता है, न उनका प्रोविडेंड फंड कटता है और न ही उनका भविष्य निधि कर्मचारी संगठन में पंजीकरण है.

सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि नियम के मुताबिक रेलवे की तरफ से कोई भी अधिकारी या प्रतिनिधि इन ठेकों की जांच करने के लिए नहीं जाता है. रेलवे ही नहीं, श्रम मंत्रालय, भविष्य निधि संगठन की तरफ से भी कोई जांच करने नहीं जाता है. ठेकेदारों को लूटने की खुली छूट मिली होती है. बिना लाइसेंस के ठेके दे दिए जाते हैं. सीएजी ने पाया कि मात्र 140 ठेकेदारों ने अपना पंजीकरण सेंट्रल लेबर कमिश्नर के दफ्तर में कराया है. उसमें से भी सिर्फ 12 ठेकेदारों ने अपना सालाना लेखा-जोखा दिया है. जबकि सभी सभी कांट्रेक्टर के लिए हिसाब देना अनिवार्य होता है. रेलवे के पास अपने सभी ठेकेदारों के रिकार्ड होने चाहिए. सीएजी ने जब मांगा तो मात्र 30 ठेकेदारों के रिकार्ड मिलें. आप सोचिए जब भारतीय रेल में तीस चालीस हज़ार करोड़ की परियोजना में ठेकेदार बिना हिसाब-किताब के काम कर रहे हैं तो लूट की राशि का पैमाना क्या होगा?

सैंकड़ों की संख्या में ठेकेदारों ने सीएजी को रिकार्ड ही नहीं दिए. सीएजी देखना चाहती थी कि कितने मज़दूरों को चेक या बैंक से भुगतान हो रहा है. नियम यही है कि भुगतान बैंक या चेक से होगा. 212 कांट्रेक्ट में तो रिकार्ड ही नहीं मिला कि पैसा कैसे दिया गया. मात्र 18 कांट्रेक्ट में वेतन की पर्ची कटी मिली. 169 कांट्रेक्ट में भुगतान नगद किया गया जबकि यह सरकार नगद भुगतान के खिलाफ बताई जाती है. उसे भ्रष्टाचार का ज़रिया मानती है लेकिन रेल मंत्री अपने ही मंत्रालय के कांट्रेक्ट में नगद भुगतान सुनिश्चित नहीं कर सके. ज़ाहिर है रेलवे में ठेकेदार जमकर लूट रहे हैं.

न्यूनतम मज़दूरी मिलने का कानून है लेकिन 463 ठेकों में से मात्र 105 में ही न्यूनतम मज़दूरी दी गई है. बहुतों ने तो रिकार्ड ही नहीं दिए. किसी भी प्रोजेक्ट की लागत तय करते वक्त न्यूनतम मज़दूरी के हिसाब से लागत तय होती है. अगर वो पैसा ठेकेदार मार लें तो कितने सौ करोड़ का हिसाब उनकी जेब में यू हीं चला जाता होगा. जनता के पैसे से सरकार ने ठेकेदारों को दिया कि आप पूरा पैसा दो मगर ठेकेदारों ने मज़दूरों को पूरा पैसा नहीं दिया. दोनों तरफ से जनता का ही पैसा लूटा गया.

मात्र 120 कांट्रेक्ट में छुट्टी मिली और छुट्टी के पैसे दिए गए. बाकी में नहीं. सीएजी ने लिखा है कि 2745 मज़दूरों के 5.46 करोड़ रुपये ठेकेदारों ने मार लिए. 49 ठेकों में न तो छुट्टी मिली और न ही छुट्टी का पैसा. 9 घंटे से ज्यादा या सप्ताह में 48 घंटे से ज्यादा काम कराने पर ओवर टाइम देना होता है. 30 कांट्रेक्ट में पाया गया कि ओवर टाइम नही दिया गया और 1.74 करोड़ रुपये मार लिए गए.

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सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि रेल मंत्रालय के भीतर कुछ खास नहीं बदला है. ठेकेदारों की मौज अभी भी जारी है. रेल मंत्री अगर काम करते, इन सब बातों को ठीक करते तो रेलवे के लाखों मज़दूर खुश होते. वाह-वाही कर रहे होते. उनका शोषण नहीं होता और रेल मंत्री को ट्वीटर पर दिन भर अपना प्रचार नहीं करना पड़ता.

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