एससी, एसटी कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुरक्षित

| August 31, 2018

पीठ ने सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत ने इस सवाल पर विचार किया कि 2006 के फैसले पर पुनर्विचार के लिए सात सदस्यीय संविधान पीठ का गठन जरूरी है या नहीं।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इस मामले में केंद्र तथा अन्य सभी पक्षकारों को सुनने के बाद गुरुवार को कहा कि वह अपनी व्यवस्था बाद में देगी। इससे पहले 2006 में एम नागराज मामले में पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने फैसला सुनाया था। इसने कहा था कि राज्य इन समुदायों को पदोन्नति में आरक्षण का लाभ देने से पहले सरकारी नौकरियों में इनके अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के बारे में तथ्य और एससी, एसटी के पिछड़ेपन से जुड़ा आंकड़ा उपलब्ध कराने के लिए बाध्य है।








केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों ने कई आधारों पर संविधान पीठ के फैसले पर पुनर्विचार का अनुरोध किया है। इसमें एक आधार यह भी है कि एससी, एसटी के सदस्यों को पिछड़ा माना जाता है। उनकी जातिगत स्थिति को देखते हुए उन्हें पदोन्नति में भी आरक्षण दिया जाना चाहिए।

केंद्र ने आरोप लगाया कि नागराज फैसले ने अनुसूचित जाति और जनजाति कर्मचारियों को आरक्षण देने के लिए अनावश्यक शर्ते लगा दी थीं। इन पर बड़ी पीठ को पुनर्विचार करना चाहिए।




केंद्र की ओर से अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने एससी, एसटी कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण देने की जोरदार वकालत की और कहा कि पिछड़ेपन को मानना ही उनके पक्ष में है। उन्होंने कहा कि यह समुदाय लंबे समय से जाति पर आधारित भेदभाव का सामना कर रहा है और अब भी उन पर जाति का तमगा लगा हुआ है।

दूसरी तरफ, इसका विरोध करने वालों का प्रतिनिधित्व करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने बुधवार को कहा था कि उच्च सेवाओं में पदोन्नति में आरक्षण नहीं होना चाहिए, क्योंकि सरकारी सेवा में आने के बाद यह पिछड़ापन खत्म हो जाता है। हालांकि, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की सेवाओं में इसे जारी रखा जा सकता है।




सुप्रीम कोर्ट ने भी इससे पहले इन समुदायों के उच्च पदों पर आसीन सदस्यों के परिजनों को सरकारी नौकरी में पदोन्नति में आरक्षण देने के औचित्य पर सवाल उठाया था। न्यायालय जानना चाहता था कि आरक्षण के लाभ से अन्य पिछड़े वर्गो में से सम्पन्न तबके को अलग रखने का नियम एससी, एसटी मामले में भी क्यों नहीं लागू किया जा सकता।

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