Supreme Court questions reservation in promotion for SC/ST

| August 24, 2018

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने उच्च पदों पर आसीन अधिकारियों के बच्चों को सरकारी नौकरी में प्रोन्नति में आरक्षण का लाभ देने के औचित्य पर सवाल उठाया है। कोर्ट ने पूछा है कि संपन्न वर्ग को आरक्षण के लाभ से बाहर करने वाला क्रीमीलेयर का जो सिद्धांत अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) मामले में लागू होता है, वह अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को प्रोन्नति में आरक्षण के मामले में क्यों नहीं लागू होता? संविधान पीठ इस मामले में बुधवार को फिर सुनवाई करेगी।








मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने गुरुवार को कहा कि नौकरी की शुरुआत में आरक्षण का नियम तो ठीक है, लेकिन कोई व्यक्ति आरक्षण का लाभ लेकर राज्य का मुख्य सचिव बन जाता है तो क्या यह तर्कसंगत होगा कि उसके बच्चों को पिछड़ा मानकर प्रोन्नति में आरक्षण दिया जाए। कोर्ट 2006 के एम. नागराज फैसले को पुनर्विचार के लिए संविधान पीठ को भेजे जाने की जरूरत पर सुनवाई कर रहा है।




नागराज फैसले पर घमासान: गुरुवार को दिनभर चली सुनवाई में प्रोन्नति में आरक्षण का समर्थन कर रही केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों और संगठनों की ओर से पेश अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल, पीएस पटवालिया, इंद्रा जयसिंह आदि ने एम. नागराज के फैसले में दी गई व्यवस्था को गलत बताते हुए उसे दोबारा विचार के लिए संविधान पीठ को भेजे जाने की मांग की, जबकि आरक्षण का विरोध कर रहे संगठनों के वकील पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण और वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने फैसले पर पुनर्विचार का विरोध किया। 2006 के एम. नागराज फैसले में पांच जजों की पीठ ने व्यवस्था दी थी कि सरकार एससी और एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण देने से पहले उनके पिछड़ेपन और पर्याप्त प्रतिनिधित्व न होने के आंकड़े एकत्र करे। धवन ने कहा कि नागराज का फैसला बिल्कुल सही है।




इंद्रा साहनी के फैसले में कहा गया था कि प्रोन्नति में आरक्षण नहीं हो सकता और इसी के बाद संसद ने कानून में संशोधन करके प्रोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था की थी। नागराज के फैसले में संविधान में मिले बराबरी के मौलिक अधिकार के बीच संतुलन कायम करते हुए व्यवस्था दी गई है। याद रहे कि आरक्षण हमेशा के लिए नहीं है और जब तक पिछड़ेपन और प्रतिनिधित्व के आंकड़े नहीं होंगे तब तक यह कैसे जाना जाएगा कि आगे आरक्षण की जरूरत है कि नहीं। धवन ने कहा कि आरक्षण के खतरनाक परिणाम दिख रहे हैं। उन्होंने इस बारे में गुजरात और गुर्जर आंदोलन का हवाला दिया।

धवन ने कहा कि गुर्जर ओबीसी आरक्षण नहीं चाहते, बल्कि एससी-एसटी आरक्षण चाहते हैं।  एससी-एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण का समर्थन कर रहे वकीलों का कहना था कि इस आरक्षण में क्रीमीलेयर का सिद्धांत लागू नहीं होता। यह सिद्धांत सिर्फ ओबीसी में लागू होता है। एससी-एसटी वर्ग अपने आप में पिछड़ा माना जाता है, जबकि आरक्षण विरोधियों का कहना था कि यह बात ध्यान रखने योग्य है कि आरक्षण हमेशा के लिए लागू नहीं हो सकता।पिछड़ेपन के आंकड़ों के बगैर प्रोन्नति में आरक्षण नहीं दिया जा सकता। आरक्षण विरोधियों की दलील:- क्रीमीलेयर का सिद्धांत समानता पर आधारित है और सरकार का दायित्व है कि वह संतुलन कायम करे।

Category: News

About the Author ()

Comments are closed.