SC/ST needs reservation in promotion – Modi Government

| August 4, 2018

एससी-एसटी हजार साल से हाशिए पर, प्रमोशन में 23% कोटा हो : केंद्र
प्रमोशन में आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई…

पिछड़ापन साबित करने की जरूरत नहीं, कोटा नहीं दिया तो पूरा मकसद ही बेकार

एससी-एसटी मुलाजिमों को सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। पांच जजों की बेंच ने कहा कि राज्य ऐसा कोई डेटा नहीं लाए हैं, जिनसे पता चले नौकरियों में एससी-एसटी का प्रतिनिधित्व कम है। इस पर केंद्र ने कहा कि यह वर्ग हजार साल से ज्यादा समय से उत्पीड़न झेल रहा है। खुद सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि इनका पिछड़ापन साबित करने की जरूरत नहीं।








प्रमोशन में 23% आरक्षण नहीं दिया तो आरक्षण का मकसद ही खत्म हो जाएगा। शुक्रवार को सुनवाई अधूरी रही। अगली सुनवाई 16 को होगी। बेंच जांच कर रही है कि 2006 में एम नागराज केस में पारित फैसला पुनर्विचार के लिए 7 जजों की बेंच को भेजा जाए या नहीं। इसमें कोर्ट ने कहा था कि क्रीमीलेयर का कॉन्सेप्ट एससी-एसटी के प्रमोशन पर लागू नहीं होता। उन्हें प्रमोशन में आरक्षण दिया जा सकता है, बशर्ते सरकार को लगे कि नौकरी में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। इसके लिए पूरा डेटा तैयार करना होगा।
चीफ जस्टिस ने पूछा…

12 साल में डेटा तैयार नहीं पिछड़ापन कैसे साबित हो?

बेंच ने कहा कि केंद्र को साबित करना होगा कि प्रमोशन से पहले एससी-एसटी का पिछड़ापन साबित करने के लिए अपर्याप्त प्रतिनिधित्व का डेटा मांगना गलत है। 12 साल में किसी भी राज्य ने सरकारी नौकरियों के कैडर में एससी-एसटी के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व का कोई डेटा तैयार क्यों नहीं किया? पिछड़ापन कैसे साबित होगा?




नागराज फैसले में समस्या सुलझाने की बजाय निपटाई गई

सीनियर एडवोकेट राजीव धवन ने कहा, “मुद्दा यह है कि एससी-एसटी को क्रीमी लेयर में बांट सकते हैं या नहीं? 1992 के इंदिरा साहनी केस में भी आबादी के अनुपात में आरक्षण की बात कही गई है। यहां “पर्याप्त’ से अर्थ यह है कि कितने लोग वरिष्ठता के हिसाब से कैडर में लिए हैं। नागराज फैसले में समस्या ही निपटाने की कोशिश की गई है।’

एससी-एसटी एक्ट: बिना जांच एफआईआर-गिरफ्तारी के नियम वाला बिल सदन में पेश

एससी-एसटी एक्ट में बिना जांच एफआईआर और बिना मंजूरी गिरफ्तारी के प्रावधान जोड़ने वाला बिल सरकार ने शुक्रवार को लोकसभा में पेश कर दिया। एक्ट के सख्त प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई शर्तें निष्प्रभावी करने के लिए सरकार को संशोधन बिल पेश करना पड़ा है। सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने एससी-एसटी अत्याचार निवारण (संशोधन) विधेयक पेश किया। संशोधित बिल में एससी-एसटी एक्ट के आरोपी को अंतरिम जमानत नहीं देने का भी प्रावधान है। दलित संगठन और सांसद सरकार पर इस बिल के लिए दबाव बना रहे थे।




अटॉर्नी जनरल बोले…
क्योंकि लोग मरते रहते हैं, रिटायर होते रहते हैं

अटॉर्नी जनरल ने कहा, लोग मरते रहते हैं। रिटायर भी होते हैं। संख्या अस्थिर रहती है। हर केस में नागराज फैसले की शर्तों का पालन संभव नहीं। एससी-एसटी के पिछड़ेपन की जांच की जरूरत नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि यह पिछड़े हैं। नागराज फैसला अपर्याप्त प्रतिनिधित्व पर बात करता है। लेकिन, इस पर विचार नहीं करता कि कौन पिछड़ा है और कौन नहीं।

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