प्रमोशन में आरक्षण का रास्ता फिलहाल साफ, सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक सरकार को छूट

| June 6, 2018

सुप्रीम कोर्ट ने एससी एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण के मामले में सरकार को कानून के मुताबिक चलने की इजाजत दे दी है। कोर्ट ने कहा है कि कानून के मुताबिक प्रोन्नति देने पर सरकार पर कोई रोक नहीं है हालांकि ये सब कोर्ट के अगले आदेश के आधीन होगा। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश को सरकार एससी एसटी के हित में बड़ी राहत बता रही है। जबकि आरक्षण का विरोध करने वाले ऐसा नहीं मानते। उनका कहना है कि कानून के मुताबिक प्रोन्नति में आरक्षण की इजाजत दी गई है और आज की तारीख में कानून दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश ही है जिस पर फिलहाल रोक नहीं है।







हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक सरकार को एम नागराज की व्यवस्था के अनुसार प्रोन्नति देने से पहले पिछड़ेपन के आंकड़े जुटाने होंगे। इन विरोधाभासी दावों का मतलब निकलता है कि इस आदेश के बाद एससी एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण को लेकर नई भ्रांति उत्पन्न हो गई है। न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल व न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने मंगलवार को सरकार की ओर से पेश एएसजी मनिंदर सिंह और आरक्षण का विरोध कर रहे प्रतिपक्षी वकील शांति भूषण व कुमार परिमल की दलीलें सुनने के बाद उपरोक्त आदेश दिया। पीठ ने कहा कि वे स्पष्ट करते हैं कि कानून के मुताबिक प्रोन्नति देने पर सरकार पर कोई रोक नहीं है। और यह सब इस मामले में कोर्ट के अगले आदेश के आधीन होगा।



इसके साथ ही कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली केन्द्र सरकार की विशेष अनुमति याचिका ऐसे ही एक मामले जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता के केस के साथ सुनवाई के लिए संलग्न कर दी है। जिसके गत 17 मई के आदेश का एएसजी मनिंदर सिंह ने मंगलवार को हवाला दिया था। इससे पहले मामले पर बहस करते हुए एएसजी मनिन्दर सिंह ने कहा कि विभिन्न उच्च न्यायालयों के आदेश के कारण प्रोन्नतियां रुकी पड़ी हैं। सरकार को अपने कर्मचारियों को प्रोन्नति देनी होती है।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों की पीठ ने गत 17 मई को ऐसे ही एक मामले में आदेश दिया है कोर्ट वही आदेश इस मामले में भी दे दे ताकि प्रोन्नतियों पर लगी रोक की स्थिति हट सके। जबकि दूसरी ओर से सरकार का विरोध करते हुए शांति भूषण और कुमार परिमल ने कहा कि एससी एससटी को प्रोन्नति में आरक्षण का मुख्य मामला पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष लंबित है। इतना ही नहीं मामला संविधान पीठ को भेजते समय कोर्ट ने ये भी कहा था कि अंतरिम आदेश के मुद्दे पर भी संविधानपीठ ही विचार करेगी, ऐसे में दो न्यायाधीशों की अवकाशकालीन इस पीठ को मामले पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए।




कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने सरकार को कानून के मुताबिक प्रोन्नति देने की इजाजत देते हुए मामले को जनरैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता के केस के साथ सुनवाई के लिए लगाने का आदेश दिया। इसी केस में गत 17 मई को दो न्यायाधीशों ने आदेश दिया था जिसमें कहा गया था कि आरक्षित श्रेणी को आरक्षित श्रेणी में और अनारक्षित श्रेणी को अनारक्षित श्रेणी में तथा मेरिट के भी आधार पर प्रोन्नति दी जा सकती है।

इस मामले में केन्द्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के गत वर्ष अगस्त के आदेश को चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने उस आदेश में प्रोन्नति में आरक्षण देने वाला केन्द्र सरकार का 13 अगस्त 1997 का आदेश रद कर दिया था। हाईकोर्ट ने फैसले मेंआधार सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के एम नागराज के 2006 के फैसले को बनाया था जिसमें व्यवस्था दी गई है कि सरकार पिछड़ेपन के आकड़े एकत्र करने के बाद ही प्रोन्नति में आरक्षण दे सकती है।

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