मोदी सरकार अब एससी/एसटी एक्ट को नौवीं अनुसूची में लाएगी, होंगे न्यायिक चुनौती के रास्ते बंद

| May 14, 2018

केंद्र सरकार अब अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम के तहत गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने के लिए एक अध्यादेश लाने वाली है। बाद में वह संसद में एक विधेयक पेश करके इस मामले में न्यायिक चुनौती के रास्ते भी बंद कर देगी। इसके लिए वह बिल को संविधान की नौवीं अनुसूची के दायरे में लाने की तैयारी कर रही है।

-गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश बदलने को केंद्र लाएगा अध्यादेश

-एक्ट को न्यायिक समीक्षा से अछूता रखने को मानसून सत्र में लाएगी बिल

सरकार के एक वरिष्ठ सूत्र ने रविवार को बताया कि अध्यादेश लाना सर्वोच्च अदालत के फैसले को पलटने की एक अंतरिम व्यवस्था है। जबकि संसद के मानसून सत्र में सरकार विधेयक लाकर एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों में आगे कोई फेरबदल रोकने का स्थायी इंतजाम करेगी। सरकार मानसून सत्र में विधेयक पेश करके इस विधेयक को संविधान की नौवीं अनुसूची के दायरे में ले आएगी। ताकि आगे भी अदालतों में इस विधेयक को चुनौती नहीं दी जा सके।








सरकार अब नहीं देगी एससी-एसटी पर राजनीति का मौका

इस साल मार्च में एससी/एसटी मामले में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने के लिए सरकार अध्यादेश में एक्ट के प्रावधानों को फिर से लागू करेगी। प्रस्तावित अध्यादेश से यह स्पष्ट हो जाएगा कि कोई भी फैसला या कोई अन्य प्रभावी कानून एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों की वैधता पर आंच नहीं ला सकेगा। कानून मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि यह अध्यादेश जारी होते ही सुप्रीम कोर्ट का आदेश पलट जाएगा। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस मामले में अगली सुनवाई 16 मई को है। बहुत कुछ इसी पर निर्भर करेगा।




अनुच्छेद 31-बी से मिलेगी सुरक्षा

प्रस्तावित विधेयक के संबंध में एक अधिकारी ने बताया कि इस विधेयक को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किए जाने के साथ ही इसे अनुच्छेद 31-बी के तहत (कुछ अधिनियमों और नियमों पर कानूनन सुरक्षा मिल जाएगी। साथ ही इसमें फिर कोई न्यायिक सुनवाई या रद्दोबदल नहीं हो सकेगी।

कोर्ट ने कहा था-निर्दोष को न हो सजा

हाल ही में केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने विगत 20 मार्च के एससी/एसटी एक्ट के कुछ प्रावधानों को हल्का करने के अपने आदेश को स्थगित करने से इन्कार कर दिया था। अदालत ने कहा था कि वह इस अधिनियम के खिलाफ नहीं है, लेकिन तत्काल गिरफ्तारी के प्रावधान से निर्दोष लोगों को सजा नहीं मिलनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में पुलिस अफसरों के लिए नए दिशा-निर्देश जारी करते हुए बताया था कि इस एक्ट के तहत झूठी शिकायतों में निर्दोष लोगों खासकर सरकारी अफसरों की सुरक्षा को किस तरह सुनिश्चित किया जाए।




पीएम ने कहा था-कमजोर न होने देंगे कानून

अदालत के इस कानून के प्रावधानों को नरम करने के बाद विभिन्न दलित और राजनीतिक संगठनों ने विगत दो अप्रैल को व्यापक प्रदर्शन किए थे। इस हिंसा में तकरीबन एक दर्जन लोग मारे गए थे। विपक्षी दलों ने भी सरकार पर दलित हितों की रक्षा में विफल रहने का आरोप लगाया था। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले महीने जोर देकर कहा था कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के प्रति जुल्म रोकने के कानून को कमजोर करने के कोई भी प्रयास सफल नहीं होने देंगे।

Category: News

About the Author ()

Comments are closed.