प्रोमोशन पर आरक्षण को हाईकोर्ट ने किया रद्द

| April 4, 2018

सरकार की ओर से अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के सरकारी कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण दिए जाने के प्रावधान को हाईकोर्ट ने रद्द करते हुए कहा कि प्रमोशन में यह आरक्षण सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन कर दिया है, जिसमें पहले सरकार को इन वर्गो का क्वान्टीफाइएबल डाटा एकत्रित किया जाना तय किया गया था। सरकार ने बिना कोई डाटा एकत्रित किए ही प्रमोशन में आरक्षण दे दिया जो पूरी तरह से गलत है। जस्टिस राजेश बिंदल एवं जस्टिस बी.एस. वालिया की खंडपीठ ने प्रमोशन में आरक्षण के इस प्रावधान को 20 को ही रद्द कर दिया था, लेकिन सोमवार को इस मामले में हाईकोर्ट ने अपना विस्तृत फैसला जारी करते हुए कहा कि सरकार के पास सभी विभागों में कार्यरत इन वर्गों का डाटा ही नहीं था।








सरकार ने हाईकोर्ट को बताया था कि राज्य के विभागों की 61 ब्रांचों में कार्यरत अनुसूचित जाति वर्ग के कर्मियों के प्रतिनिधित्व के आंकड़े जुटाए गए हैं, लेकिन इस मामले में सुनवाई के दौरान सामने आया था कि इनमें से 47 विभागों का डाटा ही अधूरा था, जिसमें कार्पोरेशन, यूनिवर्सिटी, बोर्ड, मार्कीट कमेटी, सोसायटियों, म्यूनीसिपल कौंसिलों और कमेटियों का डाटा एकत्रित ही नहीं किया गया था। ऐसे में सरकार ने जो डाटा दिया है उसे विश्वसनीय नहीं माना जा सकता है। ऐसे में फिलहाल अनुसूचित जाति वर्ग को प्रमोशन में आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता है।




हाईकोर्ट ने यह फैसला अमन कुमार सहित कुछ अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा पंजाब सरकार द्वारा अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के सरकारी कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण दिए जाने के प्रावधान के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया है। बता दें कि वर्ष 2014 में इस मामले में हाईकोर्ट में याचिका दायर कर पंजाब में अनुसूचित जाति वर्ग को सेवा में आरक्षण एक्ट 2006 के उस प्रावधान को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत पंजाब सरकार इन वर्गो के कर्मियों को प्रमोशन में आरक्षण दे रही थी। याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट को बताया था कि प्रमोशन में आरक्षण के इस प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही रोक लगा चुका है।




इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार प्रमोशन में आरक्षण देने का प्रावधान बनाए जाने से पहले कमेटी का गठन करना जरूरी है। यह कमेटी प्रदेश में अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के लोगों के पिछड़ेपन और उनके प्रतिनिधित्व के बारे में सर्वे कर रिपोर्ट तैयार करेगी। उसी रिपोर्ट के आधार पर सरकार प्रमोशन में आरक्षण देने का निर्णय ले सकती है। याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट को बताया था कि सुप्रीम कोर्ट के इन दिशा-निर्देशों के बावजूद पंजाब सरकार ने ऐसी किसी भी कमेटी का गठन किया ही नहीं और न ही सर्वे करवाया गया। बिना सर्वे किए ही प्रमोशन में आरक्षण दिया जा रहा है, जिस कारण सामान्य वर्ग के कर्मचारी प्रभावित हो रहे हैं। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट को यह भी बताया था कि वर्ष 2014 के मई माह में हरियाणा सरकार की इसी तरह की एक नीति को हाईकोर्ट रद्द कर चुका है। लिहाजा इस प्रावधान को रद्द किए जाने की हाईकोर्ट से मांग की गई थी।

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