प्रमोशन में आरक्षण: 11 साल पुराने फैसले पर फिर विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट

| January 9, 2018

नई दिल्ली :- सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच प्रमोशन में एससी और एसटी समुदायों के लोगों को आरक्षण देने के मुद्दे पर विचार करेगी। एक दशक पहले सुप्रीम कोर्ट ने ही फैसला सुनाया था कि प्रमोशन में एससी, एसटी समुदाय को आरक्षण देना राज्य सरकारों के लिए अनिवार्य नहीं है। तब कोर्ट ने कहा था कि सरकारी सेवाओं में इन समुदायों का प्रतिनिधित्व कम होने और इनके पिछड़े होने की बात साबित करने वाले मात्रात्मक आंकड़े होने पर ही इन्हें प्रमोशन में रिजर्वेशन देने का कदम राज्य उठा सकते हैं। हालांकि अब देश के अटॉर्नी जनरल और अन्य लोगों के अनुरोध पर कोर्ट इस मुद्दे पर दोबारा विचार करेगा।








जस्टिस कुरियन जोसेफ की अध्यक्षता वाली 2 जजों की बेंच ने यह मुद्दा मंगलवार को 5 जजों की बेंच के हवाले किया था। इस अनुरोध पर देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा ने बुधवार को 3 जजों की बेंच बनाई, जिसने शुरुआती सुनवाई के बाद 5 जजों की बेंच के पास यह मसला भेज दिया कि 2006 में दिए गए जजमेंट पर दोबारा गौर करने की जरूरत है या नहीं।

जस्टिस मिश्रा ने कहा कि दो जजों की बेंच इस मामले को सीधे पांच जजों की बेंच के पास नहीं भेज सकती थी, लेकिन वह ऐसी बेंच बनाने पर राजी हो गए। अभी इस मामले की सुनवाई की तारीख तय नहीं की गई है।




सुप्रीम कोर्ट की परंपरा के अनुसार, दो जजों वाली बेंच किसी मुद्दे को 3 जजों की बेंच के ही हवाले कर सकती है और 3 जजों की बेंच किसी मुद्दे को 5 जजों की बेंच के पास भेज सकती है।

मध्य प्रदेश के याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर ऐडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने 2006 के जजमेंट पर दोबारा गौर करने की मांग की। उसी जजमेंट में रिजर्वेशन की सीमा 50% तय की गई थी और आरक्षण के दायरे से क्रीमी लेयर वालों को बाहर किया गया था। इस मामले पर बहस तेज होने पर आरक्षण समर्थक और विरोधी खेमों के भी कानूनी जंग में उतर आने की स्थिति बन सकती है।

आरक्षण समर्थक लोग रिजर्वेशन की 50% लिमिट को तवज्जो न देते हुए और एससी, एसटी व्यक्ति के क्रीमी लेयर में होने या न होने की बात को दरकिनार करते हुए उनके लिए ऑटोमैटिक रिजर्वेशन की मांग करेंगे।



2006 के एम. नागराज केस में साफ कहा गया था कि प्रमोशन में रिजर्वेशन देते वक्त भी क्रीमी लेयर जैसी दूसरी बातों और 50 पर्सेंट की सीलिंग का ध्यान रखा जाएगा और ऐसे आंकड़े पर भी गौर किया जाएगा जिससे साबित होता हो कि संबंधित राज्य में एससी, एसटी पिछड़े हैं और सरकारी सेवाओं में उनका प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है।

ताजा मामले में मध्य प्रदेश के याचिकाकर्ताओं ने नागराज केस की रूलिंग पर इस आधार पर दोबारा विचार करने की मांग की है कि इंदिरा साहनी और चिन्नैया मामलों को देखते हुए पिछड़ेपन का टेस्ट एससी, एसटी पर नहीं लगाया जाना चाहिए।

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