छंटनी आसान करने के प्रस्ताव पर पीछे हटी सरकार

| December 11, 2017

नई दिल्ली : इसे लोकसभा चुनावों की तैयारी का नतीजा कहें या फिर जॉब क्रिएशन के मोर्चे पर उम्मीद के अनुरूप प्रदर्शन न कर पाने से पैदा दबाव, मोदी सरकार ने अब श्रम सुधार को ठंडे बस्ते में डालने का मन बना लिया है। इसका मतलब है कि केंद्र सरकार अब कंपनियों को ‘हायर एंड फायर’ की खुली छूट नहीं देने जा रही है।








सरकार ने जो नया प्रस्ताव तैयार किया था उसके मुताबिक किसी कंपनी में अगर 300 तक कर्मचारी काम करते हैं तो मैनेजमेंट को अपनी मर्जी से कर्मचारियों की छंटनी का अधिकार मिल जाता। लेकिन अब सरकार ने इस प्रावधान पर यू-टर्न लेने का मन बनाया लिया है। गौरतलब है कि मौजूदा समय में जिन कंपनियों में 100 कर्मचारी तक काम करते हैं, उनको अपने मनमुताबिक छंटनी का अधिकार मिला हुआ है। लेकिन सरकार छंटनी का यह दायरा बढ़ाकर 300 कर्मचारियों तक की कंपनियों को देना चाहती थी। कंपनियों की लंबे समय से मांग रही है कि उन्हें अपने बैलेंस शीट को देखते हुए कर्मचारियों को रखने और उन्हें निकालने का अधिकार दिया जाए।




मोदी सरकार ने क्यों वापस खींचे कदम?

सूत्रों का कहना है कि सरकार छंटनी को आसान बनाने की शर्तों को ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी में है। दरअसल, बढ़ती बेरोजगार की वजह से सरकार जोखिम नहीं लेना चाहती। नोटबंदी और जीएसटी के बाद सरकार अब ऐसा कोई अलोकप्रिय कदम नहीं उठाना चाहती, जिसके चलते उसे लोगों की नाराजगी का सामना करना पड़े। इसके अलावा सरकार के कदम पीछे खींचने के पीछे मजदूर संगठनों का भारी विरोध भी एक बड़ी वजह बताया जा रहा है।

गौरतलब है कि इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड बिल के तहत छंटनी की शर्तें आसान बनाने का प्रस्ताव है। कुल 300 तक कर्मचारियों वाली कंपनी को बगैर सरकारी मंजूरी के छंटनी का अधिकार देने और सरकारी मंजूरी के बाद कंपनी बंद करने का अधिकार देने का प्रस्ताव था। हालांकि इस प्रस्ताव में छंटनी के नियम आसान बनाने के साथ-साथ मुआवजा बढ़ाने का भी प्रस्ताव शामिल किया गया था। छंटनी की सूरत में 15 दिन के बजाय तीन गुनी तक सैलरी देने का प्रस्ताव शामिल किया गया है।




क्या कहना है मजदूर यूनियन का

भारतीय मजदूर संघ के उपाध्यक्ष विरजेश उपाध्याय का कहना है कि इस वक्त देश को अधिक संख्या में रोजगार की जरूरत है। ऐसे में कोई भी ऐसा कानून या प्रस्ताव जो रोजगार छीनने का हो, उसे किस तरह से बर्दाश्त किया जा सकता है? नैशनल ऑर्गेनाइजेश ऑफ बैंक वर्कर्स के अश्विनी राणा का कहना है कि भारत जैसे देश में जहां सोशल सिक्योरिटीज के नाम पर नौकरी और पीएफ का ही प्रावधान है, वहां पर रोजगार छीनने का खुला अधिकार कैसे दिया जा सकता है। हम बैंक मर्जर का इसलिए विरोध कर रहे हैं, क्योंकि मर्जर के नाम पर लोगों के रोजगार पर खतरे की तलवार लटक गई है। ऐसे में सरकार हो या कंपनी, सबका दायित्व है कि वह अपने बेहतर प्रबंधन का परिचय देते हुए देश की अर्थव्यवस्था और बाजार को बेहतर बनाने का प्रयास करें। ऐसा कोई कानून न लाए, जिसका दुरुपयोग होने की संभावना हो।

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Category: Indian Railways, News

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