Has Govt. gone far too away on Labour Reforms?

| November 18, 2017

.. आखिर श्रम सुधार पर कैसे पीछे हटे सरकार ! विनिवेश,एफडीआई और आर्थिक नीतियों पर भी सरकार नहीं मान सकती बीएमएस की बातबीएमएस का दावा जेटली ने मांगों पर गंभीरता से गौर करने का किया है वादा

सोशल सिक्युरिटी का दायरा बढ़ाने तक तो ठीक है पर श्रम सुधारों पर पीछे हटने और एफडीआई(प्रत्यक्ष विदेशी निवेश)नहीं करने की बात सरकार कैसे मान सकती है ? आरएसएस के श्रमिक संगठन भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने वित्त मंत्री अरुण जेटली को सौंपे ज्ञापन में ये ही बातें कहीं है। यह दिलचस्प है कि बीएमएस ने ही कुछ समय पूर्व अपने दफ्तर आमंत्रित करके वित्त मंत्री का सम्मान किया था और अब वो ही कह रही है कि सरकार की आर्थिक नीतियां मानवीय नहीं हैं। यानि सीधे कहें तो बीएमएस कह रहा है कि आर्थिक नीति मानव कल्याण से परे है और जितनी जल्दी हो सके बदली जाए।








बीएमएस का दावा है कि वित्त मंत्री जेटली ने मुलाकात में आास्त किया है कि सरकार उनकी मांगों पर गंभीरता से गौर करेगी। पर सवाल ये है कि क्या श्रम सुधार पर बहुत आगे बढ़ चुकी सरकार पीछे हटेगी ? क्या सरकार सार्वजनिक उपक्रमों का विनिवेश बंद कर देगी और एफडीआई लाना बंद कर देगी ? बीएमएस के महासचिव बृजेश उपाध्याय बढ़-चढ़कर बोलने की बजाय सुलझी हुई बात करते हैं। वो कहते हैं कि लचर और अप्रासंगिक हो चुके श्रम कानून सरकार शौक से बदले,हम भी चाहते हैं कि ऐसे कानून न रहें। उपाध्याय कहते हैं कि श्रम सुधार के नाम पर श्रमिकों के अधिकारों में कटौती अस्वीकार्य है, ये ही बात हम सरकार को समझा रहे हैं।




उन्होंने कहा कि व्यवसाय में सुगमता के नाम पर श्रमिकों को दबाने वाले सुधार बीएमएस कभी स्वीकार नहीं करेगा। बीएमएस नेता ने कहा कि इस बात को समझना होगा कि श्रमिकों को खुश रखकर ही व्यवसाय बढ़ाया जा सकता है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के खाताधारकों को बड़ी मुश्किल से 1000 रपए की न्यूनतम पेंशन मिल पा रही है, बीएमएस इसे बढ़ाकर 3000 करने की मांग कर रहा है। श्रम और रोजगार मंत्री संतोष गंगवार का कहना है कि ये मांग जायज है लेकिन इसे पूरा किया जाना मुश्किल है। न्यूतनम मजदूरी सभी क्षेत्रों में प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग बीएमएस ने उठाई है पर इस बारे में केंद्र सरकार ये कहकर पल्ला झाड़ती रही है कि यह राज्यों का काम है। अब भी सरकार इस पर आगे बढ़ेगी कहना मुश्किल है।




सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण या विनिवेश नहीं करने सम्बंधी बीएमएस की जो मांग है वो सरकार कभी मानने वाली नहीं है भले ही बीएमएस इसके पक्ष में कितनी ही अच्छी दलील क्यों न रखे।यही बात एफडीआई पर लागू होती है। सरकार को धन चाहिए और एफडीआई व सार्वजनिक उपक्रमों का विनिवेश इसके लिए अधिक सुगम रास्ता है। आयकर सीमा 5 लाख रपए करने वाली मांग अभी प्रासंगिक है क्योंकि जल्द ही सरकार बजट पर काम करने वाली है।बीएमएस की सबसे अनुकूल मांग कही जाए तो वो आंगनवाडी और आशा कार्यकर्ताओं समेत उन सभी श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना है जो सरकार ने विभिन्न योजनाओं में लगाकर रखे हैं। सरकार भी इस पर आगे बढ़ना चाहती है और इस पर काफी काम बीएमएस के सहयोग से सरकार ने किया भी है।

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