प्रमोशन का मामला कोर्ट में, हजारों कर्मचारी प्रभावित

| November 17, 2017

नई दिल्ली : प्रमोशन में आरक्षण का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित रहने का असर केंद्र सरकार के हजारों कर्मचारियों और अधिकारियों पर पड़ा है। कई विभागों और मंत्रालयों में पिछले डेढ़ साल से किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को प्रमोशन नहीं मिला है। अब इस मामले में प्रमोशन से वंचित कर्मचारी कोर्ट जाने की बात कह रहे हैं। हालांकि, सरकार का कहना है कि ऐसा कोई नीतिगत आदेश नहीं जारी किया गया है। जब तक कोर्ट का आदेश नहीं आता है, तब तक किसी को प्रमोशन नहीं मिलेगा। लेकिन हालात यह है कि मई 2016 से किसी भी अधिकारी सा कर्मचारी को प्रमोशन नहीं दिया गया। नतीजा यह निकला कि अभी 250 डिप्टी सेक्रेटरी, 337 अंडर सेक्रेटरी और 1574 सेक्शन ऑफिसर के पद खाली हैं, जो इन डेढ़ साल में प्रमोशन से भरने थे।







डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनेल ऐंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) हर महीने केंद्रीय विभागों और मंत्रालयों में काम करने वालों को प्रमोशन देने का आदेश जारी करती है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग फैसलों में प्रमोशन में आरक्षण पर रोक लगा रखी है। हालांकि, इस आदेश को चुनौती भी दी गई है। सरकार इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रही है। लेकिन अधिकारियों और कर्मचारियों का आरोप है कि कहीं भी आदेश में चल रहे वाजिब प्रमोशन को रोकने का निर्देश नहीं है।




फर्जी तरीके से पाई नौकरी, अब आएगी शामत

इस बीच केंद्र सरकार ने फर्जी जाति प्रमाण पत्र पर नौकरी पाए कर्मचारियों के खिलाफ अपना अभियान और तेज कर दिया है। डीओपीटी सूत्रों के मुताबिक, अब तक लगभग 3000 नौकरियां जांच के दायरे में आ चुकी हैं, जिनमें लगभग 50 ग्रेड ए अधिकारी हैं। डीओपीटी ने 31 मार्च 2018 से पहले सभी लंबित मामलों का निबटारा करने को कहा है। डीओपीटी ने साफ कहा है कि अगर तब तक जांच पूरी नहीं होती है तो आगे जांच अधिकारी भी कार्रवाई के दायरे में आएंगे।

प्रोन्नति में एससी-एसटी को आरक्षण देने के मामले में 2006 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला केंद्र में आ गया है। पांच सदस्यीय संविधान पीठ अब पहले यह तय करेगी कि इसके लिए पिछड़ेपन और अपर्याप्त2009प्रतिनिधित्व होने के आंकड़े जुटाने का आदेश देने2009वाले संविधान पीठ के एम. नागराज मामले में दिये गए फैसले2009पर पुनर्विचार की जरूरत है भी कि नहीं।

बता दें कि2009एससी-एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण देने के एम नागराज के फैसले में 2006 में पांच जजों ने संशोधित संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 16(4)(ए), 16(4)(बी) और 335 को तो सही ठहराया गया था, लेकिन कहा था कि आरक्षण देने से पहले सरकार को उनके पिछड़ेपन और अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के आंकड़े जुटाने होंगे।1दरअसल 2005 में ईवी चेन्नैया के फैसले में पांच जजों ने आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा एससी-एसटी में किए गए वर्गीकरण को असंवैधानिक ठहराया था।




कोर्ट ने कहा था कि एससी-एसटी के बारे में राष्ट्रपति के आदेश पर जारी सूची में कोई छेड़छाड़ नहीं हो सकती। उसमें सिर्फ संसद ही कानून बनाकर बदलाव कर सकती है।1दो जजों ने इसलिए संविधान पीठ को भेजा था मामला : जस्टिस कुरियन जोसेफ व जस्टिस आर. भानुमति की पीठ ने एससी-एसटी को प्रमोशन में आरक्षण का मामला संविधान पीठ को भेजते हुए बुधवार के आदेश में कहा है कि ईवी चेन्नैया और एम. नागराज दोनों मामलों में एससी-एसटी के पिछड़ेपन की चर्चा हुई है।

लेकिन एम. नागराज का फैसला बाद में आने के बावजूद उसमें चेन्नैया के फैसले का जिक्र नहीं है। इसके अलावा इस मामले में एससी-एसटी में क्रीमीलेयर का मुद्दा भी उठा है। इसलिए मामले पर अनुच्छेद 145(3) में संविधान पीठ को विचार करना चाहिए। जस्टिस कुरियन की पीठ ने इसके लिए मामला मुख्य न्यायाधीश के सामने पेश करने का आदेश दिया था।

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