पदोन्नति में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में बहस

| November 16, 2017

संविधान के अनुच्छेद 16(4)(4ए)(4बी) की व्याख्या को दी गई चुनौती को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति में आरक्षण पर बहस एक बार फिर से शुरू होने जा रही है। सीजेआई जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने बुधवार को इस मामले को संविधान पीठ को सौंप दिया। अब संवैधानिक पीठ तय करेगी कि 2006 में आए एम नगराज फैसले पर फिर से विचार करने की जरूरत है या नहीं।








संविधान पीठ इस सवाल का जवाब देगी कि क्या नगराज फैसले पर पुन: विचार की जरूरत है। हालांकि, वह इस फैसले के गुणदोष पर नहीं जाएगी। जस्टिस कुरयिन जोसेफ की पीठ ने मंगलवार को राय दी थी कि मामला संवधिान पीठ के समक्ष रखा जाए। इसलिए पीठ ने मामले को सीजेआई को रेफर कर दिया था। अटॉर्नी जरनल केके वेणुगोपाल ने बुधवार को इस मामले को सीजेआई की पीठ के समक्ष उठाया। इस दौरान कई अधिवक्ताओं ने कहा कि दो जजों की पीठ मामले को सीधे संविधान पीठ के समक्ष नहीं भेज सकती।




इसके लिए पहले उसे बड़ी बेंच यानी तीन जजों की बेंच को भेजना होगा। हालांकि सीजेआई पीठ इस मुद्दे पर नहीं गई और कहा कि वह इस मामले के लिए संविधान पीठ का गठन करेगी, जो यह देखेगी कि क्या नगराज फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत है या नहीं। दो जजों की पीठ ने मंगलवार के आदेश में कहा था कि इंदिरा साहनी, ईवी चिनैया और एम नगराज के संदर्भ में अनुच्छेद 16 की व्याख्या का मुद्दा बहस का विषय है। उन्होंने कहा नगराज फैसले पर फिर से विचार करने की मांग की गई है। यह भी कहा गया है कि नगराज मामले में ईवी चिनैया का संदर्भ नहीं लिया गया है। जबकि यह इससे पहले का फैसला है।





सुप्रीम कोर्ट तीन साल पहले उत्तरप्रदेश में पदोन्नति में आरक्षण देने का प्रावधान रद्द कर दिया था। यह प्रावधान तत्कालीन बसपा सरकार ने किया था। इस फैसले के बाद राज्य में सभी प्रोन्नत लोगों को पदावनत कर दिया गया था।

यह मामला त्रिपुरा हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील से सामने आया है। इसमें त्रिपुरा एससी-एसटी (सेवा पोस्ट में आरक्षण) कानून, 1991 की धारा 4(2) को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इस प्रावधान के कारण सामान्य श्रेणी के लोगों को बराबरी के अधिकार से वंचित कर दिया है क्योंकि सरकार ने आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को प्रमोशन दे दिया है। यह नगराज मामले का सरासर उल्लंघन है। लेकिन राज्य सरकार ने दलील दी कि त्रिपुरा जैसे राज्य में जहां एससी एसटी की आबदी 48 फीसदी है वहां आरक्षण में 50 फीसदी की सीमा (इंदिरा साहनी फैसला 1992) नहीं मानी जा सकती। त्रिपुरा हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ राज्य ने अपील 2015 में दायर की थी, जो अब सुनवाई पर आई है।
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