Piyush Goyal to change conditions for development of Railway Stations

| October 22, 2017

स्टेशन विकास परियोजना की शर्तो में होगा बदलाव, स्टेशन विकास में निवेशकों का उत्साह बढ़ाने की दिशा में रेलवे का कदम, रेल मंत्री शीघ्र ही संशोधित शर्तो को कैबिनेट से दिलाएंगे मंजूरी

नई दिल्ली : रेलवे ने स्टेशन विकास परियोजना में बड़े फेरबदल का फैसला लिया है। योजना के प्रति निवेशकों के उदासीन रुख को देखते हुए अब स्कीम की शर्तो में बदलाव कर उन्हें और आकर्षक बनाया जाएगा। पिछले दिनों रेल मंत्री पीयूष गोयल ने रेलवे बोर्ड, इंडियन रेलवे स्टेशन डेवलपमेंट कारपोरेशन तथा क्षेत्रीय महाप्रबंधकों के साथ स्टेशन विकास परियोजना की समीक्षा की थी। इस दौरान उन्होंने पाया कि हबीबगंज और गांधी नगर स्टेशनों के टेंडर आबंटित होने के बाद अन्य स्टेशनों के लिए निवेशकों ने विशेष उत्साह नहीं दिखाया है। इसका कारण जानने के लिए गोयल ने देश की रियल सेक्टर की प्रमुख कंपनियों के प्रमुखों को बुलाकर चर्चा की।








इसमें पता चला कि कोई भी कंपनी 45 साल की लीज पर स्टेशनों का विकास करने के प्रति उत्सुक नहीं है। कंपनियों का कहना था कि रियल सेक्टर की परियोजनाओं की तरह स्टेशनों का विकास भी 99 वर्ष की लीज के आधार पर होना चाहिए। इसके अलावा स्टेशनों पर मॉल और मल्टीप्लेक्स के साथ-साथ आवासीय कांप्लेक्स बनाने की इजाजत भी दी जानी चाहिए। क्योंकि केवल मॉल और मल्टीप्लेक्स के विकास से स्टेशन विकास के लिए किए जाने वाले भारी-भरकम निवेश पर समुचित रिटर्न मिलना मुश्किल है। कंपनियों ने मेंटीनेंस कांट्रैक्ट की अवधि को भी 5-20 वर्ष तक बढ़ाए जाने की मांग की है। कंपनियों के सुझाव के आधार पर अब मंत्रलय ने एग्रीमेंट की शर्तो में बदलाव करने का निर्णय लिया है। कैबिनेट से मंजूरी के बाद इन शर्तो को लागू किया जाएगा।




रेलवे का इरादा स्टेशन विकास परियोजना के तहत 400 स्टेशनों का विकास कर उन्हें विश्वस्तरीय सुविधाओं से लैस करने का है। इनमें से आठ स्टेशनों का विकास स्टेशन डेवलपमेंट कारपोरेशन द्वारा पीपीपी के तहत कराया जाएगा। इसके तहत हबीबगंज और गांधीनगर स्टेशनों के ठेके दिए जा चुके हैं। जबकि आनंद विहार, चंडीगढ़, शिवाजी नगर, सूरत तथा मोहाली के ठेके प्रक्रिया में हैं।123 स्टेशनों का विकास स्विस चैलेंज पद्धति से करने का है। इन पर 30 हजार करोड़ रुपये के निवेश का अनुमान है। इनमें कानपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, जम्मू तवी, फरीदाबाद, रांची, हावड़ा, भोपाल, इंदौर, उदयपुर, कामाख्या, मुंबई सेंट्रल, लोकमान्य तिलक, बांद्रा टर्मिनस, बोरीवली, ठाणो, पुणो, सिकंदराबाद, विजयवाड़ा, विशाखापत्तनम, बंगलूर, कोझीकोड और चेन्नई के नाम शामिल हैं।

रेलवे ने स्टेशन विकास के लिए कुल तीन मॉडल बनाए हैं। इनमें एक पीपीपी मॉडल है जिसमें परियोजना का प्लान बनाने और वैधानिक मंजूरी लेने के बाद डेवलपर का चुनाव किया जाता है। दूसरा मॉडल विदेशी सरकारों के सहयोग से स्टेशनों का विकास करने का है। जबकि तीसरा और अंतिम मॉडल स्विस चैलेंज पद्धति है। इसमें एक बिडर्स का चयन कर उससे स्टेशन का डिजाइन तैयार करने और खर्च बताने को कहा जाता है। फिर इस प्लान को बाकी बिडर के समक्ष पेश कर उनसे इससे कम खर्च पर प्रोजेक्ट पूरा करने की चुनौती रखी जाती है। यदि कोई कंपनी तैयार होती है तो प्रोजेक्ट उसे दे दिया जाता है और उससे डिजाइन बनाने वाली मूल कंपनी को उसका खर्च देने को कहा जाता है। अन्यथा मूल कंपनी प्रोजेक्ट को पूरा करती है।




नई दिल्ली : रेलवे बोर्ड ने 275 पुराने पुलों की मरम्मत के साथ 252 पुलों पर गति सीमा लागू करने का निर्णय लिया है। इसी के साथ बोर्ड पुलों की निगरानी, निरीक्षण और मरम्मत में लापरवाही बरते जाने के खिलाफ सभी जोनों व डिवीजनों का आगाह किया है।1रेलवे बोर्ड ने पिछले दिनों देश भर में रेलवे पुलों की स्थिति का सर्वेक्षण कराया था। इनमें 275 पुलों को मरम्मत योग्य पाया गया। सर्वेक्षण में यह तथ्य उभर कर सामने आया है कि मरम्मत योग्य पुलों में केवल 23 पुलों पर ट्रेनों के लिए गति सीमा लागू है। जबकि बाकी पुलों पर गाड़ियां सामान्य गति से गुजरती हैं। बोर्ड ने इसे संरक्षा के लिहाज से अत्यंत खतरनाक माना है और संबंधित अधिकारियों को पुलों की मरम्मत के साथ-साथ उन पर गति सीमा लागू करने का निर्देश दिया है।

इस संबंध में जारी आदेश में बोर्ड ने लिखा है, ‘मुख्य पुल अभियंताओं (सीबीई) को अपने-अपने जोन में ओआरएन-1 तथा ओआरएन-2 की रेटिंग के अंतर्गत चिह्न्ति सभी पुलों की स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए और उनके पुनरुद्धार की योजना तैयार करनी चाहिए।’1रेलवे पुलों की स्थिति के अनुसार ओवरआल रेटिंग (ओआरएन) की जाती है। सबसे खराब स्थिति वाले पुल को ओआरएन-1 रेटिंग दी जाती है, जिसका मतलब है कि उस पुल को तुरंत मरम्मत की आवश्यकता है। ओआरएन-2 रेटिंग का मतलब है कि उक्त पुल को निर्धारित समय पर रिपेयर किया जाएगा। जबकि विशेष मरम्मत योग्य पुल को ओआरएन-3 रेटिंग प्रदान की जाती है।

आदेश में कहा गया है, ‘ऐसा प्रतीत होता है कि जोनों ने इन पुलों के पुनरुद्धार की समयबद्ध प्लानिंग नहीं की है। इससे यह संदेह पैदा होता है कि इनकी रेटिंग इनकी वास्तविक स्थिति के अनुरूप हुई भी है या नहीं। यह भी महसूस होता है कि डिवीजन और मुख्यालय स्तर पर भी असिस्टेंट डिवीजनल इंजीनियर द्वारा प्रदत्त रेटिंग को लेकर कोई गंभीरता नहीं दर्शाई जाती।’यह भी पाया गया है कि ज्यादातर मामलों में मरम्मत योग्य पुलों पर न तो किसी तरह की गति सीमा लागू की गई है और न ही चीफ ब्रिज इंजीनियरों की तरफ से निरीक्षण का कोई कार्यक्रम ित किया गया है। यही नहीं, कई पुलों पर लागू गति सीमा उनकी रेटिंग के अनुरूप नहीं है।

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Category: Indian Railways, News

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