Is Bullet Train Cheaper than Metro? Reasons – Why India preferred Japanese Technology?

| October 8, 2017

देश की पहली बुलेट ट्रेन की नींव अहमदाबाद और मुंबई के बीच रखी जा चुकी है। इसे बड़ी उपलब्धि बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि जापान ने जितनी सस्ती ब्याज दर पर इसके लिए लोन दिया है, उससे यह प्रोजेक्ट लगभग मुफ्त में तैयार हो जाएगा। सवाल है कि क्या वाकई जापान ने इतना सस्ता लोन दिया है? क्या वाकई इस सस्ते लोन की वजह से मेट्रो के उलट बुलेट ट्रेन फायदे का सौदा होगी? ऐसे ही तमाम सवालों का जायजा ले रहे हैं गुलशन राय खत्री

देश की पहली बुलेट ट्रेन की नींव 14 सितंबर को पीएम नरेंद्र मोदी और जापान के पीएम शिंजो आबे ने रखी। अभी तक कुल 15 देशों में चल रही बुलेट ट्रेन की सर्विस को देखकर पीएम मोदी खासे उत्साहित हैं। उनका मानना है कि बुलेट ट्रेन के लिए जापान से जो सस्ते लोन का इंतजाम हुआ है, वह देश के हित में है और इस प्रोजेक्ट के आने से देश और तेजी से तरक्की करेगा।








पहले भी दिया है जापान ने लोन
हालांकि यह पहला मौका नहीं है, जब जापान ने भारत के किसी प्रॉजेक्ट के लिए लोन दिया हो। इससे पहले मेट्रो ही नहीं बल्कि रेलवे के डेडिकेटिड फ्रेट कॉरिडोर के लिए भी जापान के बैंक जाइका ने लोन दिया है। इस बार खासियत यह है कि जापान ने 0.1 फीसदी की दर पर बुलेट ट्रेन के लिए लोन दिया है, जबकि दिल्ली मेट्रो के लिए वह 1.4 फीसदी की ब्याज दर पर लोन देता रहा है। जाहिर है कि सस्ते लोन के मामले में बुलेट ट्रेन ने बाजी मारी है। यही नहीं, मेट्रो के लोन की अदायगी जहां 10 साल बाद शुरू होती है, वहीं बुलेट ट्रेन का लोन 15 साल बाद चुकाया जाना शुरू होगा। इसी तरह मेट्रो को 10 साल बाद ब्याज और मूल रकम की अदायगी शुरू करके अगले 20 साल में लोन चुकाना होता है, लेकिन बुलेट ट्रेन के मामले में यह अवधि लगभग 35 साल है।

क्या वाकई सस्ता पड़ेगा यह लोन!
वैसे, इस सस्ते लोन का दूसरा पहलू भी है। यह पहलू इसलिए अहम है क्योंकि इससे प्रॉजेक्ट की लागत पर परोक्ष रूप से असर पड़ेगा। बुलेट ट्रेन प्रॉजेक्ट का सबसे अहम बिंदु यह है कि मेट्रो के लिए अब तक बैंक जाइका के जरिए जापान ने जो भी लोन दिया है, वह सामान खरीदने की शर्त से बंधा नहीं था। यानी जाइका सीधे-सीधे मेट्रो प्रॉजेक्ट के लिए लोन देता रहा है। उसके साथ जापान से सामान खरीदने की शर्त नहीं थी, लेकिन बुलेट ट्रेन प्रॉजेक्ट में यह शर्त है। इस शर्त के मुताबिक, जापान बुलेट ट्रेन के लिए लोन और तकनीक तो देगा लेकिन भारत को बुलेट ट्रेन प्रॉजेक्ट के लिए लगभग 45 फीसदी सामान जापान से ही खरीदना होगा। इसमें सिग्नलिंग सिस्टम से लेकर कोच और इंजन तक शामिल हैं। इसी तरह यह शर्त भी है कि बुलेट ट्रेन प्रॉजेक्ट से जुड़े कुछ दूसरे कामों में भी भारतीय कंपनियों के साथ-साथ जापानी कंपनियों की भागीदारी होनी चाहिए।




हालांकि यह जरूर कहा जा सकता है कि भारत बुलेट ट्रेन बनाने के मामले में एक्सपर्ट नहीं है। ऐसे में हमें तकनीक की भी जरूरत है और एक्सपर्ट्स की भी। जाहिर है, जापान से बुलेट ट्रेन के लिए तकनीक और सामान खरीदना हमारी मजबूरी है। जापान जितना लोन दे रहा है, उसमें से लगभग आधा लोन वह नकद राशि के रूप में नहीं दे रहा बल्कि उतनी लागत का सामान हमें बेच रहा है। इस तरह से जापान सिर्फ हमारा नहीं, बल्कि अपना भी फायदा कर रहा है।

चीन का कोई ऑफर नहीं था
कुछ लोगों का मानना है कि चीन से हमें बुलेट ट्रेन सस्ती मिल सकती थी तो फिर चीन को यह प्रॉजेक्ट क्यों नहीं दिया गया? इस पर इंडियन रेलवे के सूत्रों का कहना है कि मुंबई-अहमदाबाद रूट पर बुलेट ट्रेन कॉरिडोर प्रॉजेक्ट के लिए चीन की तरफ से कोई ऑफर नहीं था। चूंकि यह प्रॉजेक्ट भारत और जापान की सरकारों ने आपसी सहमति से स्वीकार किया है इसलिए इस प्रॉजेक्ट के लिए कोई टेंडर नहीं किया गया था। इस वजह से इसमें चीन की पेशकश का कोई सवाल ही नहीं है। इस प्रॉजेक्ट से जुड़े एक सीनियर अधिकारी के मुताबिक यह जरूर है कि चीन भी दिल्ली-चेन्नै के बीच हाईस्पीड ट्रेन प्रॉजेक्ट के लिए स्टडी कर रहा है। उसकी डिटेल्ड प्रॉजेक्ट रिपोर्ट आने के बाद ही तय किया जाएगा कि उस कॉरिडोर का निर्माण चीन करेगा या फिर किसी और देश के साथ मिलकर यह काम पूरा किया जाएगा।

bullet v metro

वैसे, माना जा रहा है कि यह प्रॉजेक्ट देश को तकनीक के लिहाज से काफी आगे ले जाएगा। इंडियन रेलवे के प्रवक्ता अनिल सक्सेना के मुताबिक इस कॉरिडोर के बनने से सफर तो आसान होगा ही, साथ ही रोजगार के नए साधन मिलेंगे। भले ही शुरू में कुछ ट्रेनें जापान से आएं, लेकिन उसके बाद बाकी ट्रेनें देश में ही बनाई जाएंगी। बाद में देश में बनी ट्रेनों का निर्यात भी किया जा सकेगा। इस तरह यह प्रॉजेक्ट तकनीक के मामले में हमारे लिए बड़ा मददगार साबित होगा।




येन की मजबूती से रुपया मजबूर
बुलेट ट्रेन के 508 किमी लंबे प्रॉजेक्ट पर 1 लाख 10 हजार करोड़ रुपये की लागत आनी है और उसमें से जापान से 88 हजार करोड़ रुपये का लोन लिया जा रहा है। इस लोन के लिए जापान सिर्फ 0.1 फीसदी ब्याज लेगा लेकिन इसका एक पहलू भारतीय और जापानी करेंसी की वैल्यू भी है। भारत में महंगाई दर लगातार बढ़ रही है, जिससे रुपये की वैल्यू कम होती जा रही है। दूसरी ओर येन करेंसी बड़ी तेजी से ऊपर-नीचे होती है और अगर मेट्रो के लोन के आंकड़ों को देखें तो पता चलेगा कि भले ही ब्याज दर 0.1 फीसदी ही हो लेकिन येन की मजबूती और रुपये की कमजोरी का असर इस तरह के लोन पर भी पड़ेगा ही।

कुछ वक्त पहले जब दिल्ली मेट्रो ने इस मामले में कुछ आंकड़ें तैयार किए तो पता चला कि उसे भले ही 1.4 फीसदी की दर पर लोन मिला हो, लेकिन इस पर लगभग चार फीसदी की अतिरिक्त लागत भी आई। यानी येन के उतार-चढ़ाव की वजह से हमें चार फीसदी अतिरिक्त खर्च करना पड़ा। इस तरह यह लोन हमें 1.4 फीसदी के बजाय 5.4 फीसदी की दर से पड़ा।

मेट्रो के मुकाबले सस्ता प्रॉजेक्ट
अलबत्ता बुलेट ट्रेन के प्रॉजेक्ट की लागत की बात करें तो वह मेट्रो के मुकाबले कम है। अब तक की डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) के मुताबिक बुलेट ट्रेन की लागत लगभग 217 करोड़ रुपये प्रति किमी आएगी। दूसरी ओर, अगर दिल्ली मेट्रो के चौथे प्रॉजेक्ट की डीपीआर को आधार माना जाए तो चौथे फेज में दिल्ली में मेट्रो प्रॉजेक्ट की लागत 528 करोड़ रुपये प्रति किमी होगी। लेकिन सबसे अहम है कि क्या मेट्रो की तरह ही बुलेट ट्रेन भी घाटे का सौदा तो नहीं बन जाएगी?

दिल्ली मेट्रो में किराये को लेकर फिलहाल बवाल चल रहा है। ऐसे में बुलेट ट्रेन को लेकर भी भविष्य में इसी तरह की दिक्कत आ सकती है। इसकी वजह यह है कि बुलेट ट्रेन के ट्रैक पर सिर्फ बुलेट ट्रेन ही चलेगी यानी अहमदाबाद और मुंबई के बीच चलने वाली ट्रेन ही इस लाइन पर चलेगी। ऐसे में पैसेंजरों की जरूरत के मुताबिक इस ट्रेन के सीमित ट्रिप ही लग पाएंगे। सवाल है कि ऐसे में इसका टिकट कितने का होगा? हालांकि रेलवे का दावा है कि इसका किराया राजधानी और शताब्दी जैसे ट्रेनों की फर्स्ट क्लास से कुछ ही ज्यादा होगा लेकिन क्या 88 करोड़ रुपये सालाना ब्याज के अलावा मेंटनेंस और कर्मचारियों के खर्चों को मिलाने के बाद जो खर्च बैठेगा, उसके मुकाबले रेलवे किराये से इतनी आमदनी कर पाएगा कि बुलेट ट्रेन घाटे में न रहे?

यहां यह भी अहम है कि सस्ती हवाई यात्रा के कारण लोग अब लंबी दूरी के लिए ट्रेन के बजाय प्लेन को तरजीह देने लगे हैं। अहमदाबाद से मुंबई की जो दूरी बुलेट ट्रेन सवा दो-ढाई घंटे में तय करेगी, उसे हवाई यात्रा से महज सवा घंटे में पूरा किया जा सकता है। ऐसे में यात्रियों को लुभाने में बुलेट ट्रेन कितनी कामयाब होगी, इस सवाल का जवाब तो भविष्य में ही मिल पाएगा!

बुलेट ट्रेन से जुड़ी खास बातें
-508 किमी का फासला तय करेगी पहली बुलेट ट्रेन मुंबई से अहमदाबाद के बीच
-320 किमी/घंटा की होगी स्पीड, लगेंगे करीब सवा दो घंटे
-468 किमी जमीन के ऊपर, 30 किमी जमीन के अंदर और 10 किमी जमीन पर दौड़ेगी बुलेट ट्रेन
-7 किमी समंदर के नीचे दौड़ेगी ट्रेन ठाणे और वसई के बीच
-21 किमी लंबी सुरंग से गुजरेगी यह
-12 स्टेशन होंगे अहमदाबाद से मुंबई के बीच
-10 कोच होंगे शुरू में, जिनमें 750 मुसाफिर कर सकेंगे सफर
-24 ट्रेनें जापान से आएंगी, बाकी भारत में बनेंगी
-अगस्त 2022 में हो जाएगी शुरू

जापानी ट्रेनें ही क्यों
-53 साल में नहीं हुआ जापान की बुलेट ट्रेन में कोई हादसा
-800 बुलेट ट्रेन रोज दौड़ती हैं जापान में
-ऑटोमैटिक ट्रेन कंट्रोल सिस्टम से चलती है बुलेट ट्रेन

जापान से लोन: बुलेट ट्रेन v/s मेट्रो ट्रेन
बुलेट ट्रेन
प्रॉजेक्ट की लंबाई: 508 किमी लगभग
खर्च आएगा: एक लाख 10 हजार करोड़ रुपये
जापान से लोन: 88 हजार करोड़ रुपये
ब्याज दर: 0.1 फीसदी
ब्याज अदायगी शुरू होगी: 15 साल बाद
लोन टाइप: सशर्त लोन, जिसमें 45 फीसदी सामान जापान से ही लेना होगा।

मेट्रो ट्रेन
लोन पर ब्याज दर: 1.4 फीसदी
अदायगी की शुरुआत: 10 साल बाद
लोन टाइप: जापान से सामान खरीदना जरूरी नहीं
जापान का लोन बकाया: 26 हजार 760 करोड़ रुपये, 31 मार्च 2017 तक
लोन चुकाया: 1507.12 करोड़ रुपये चुकाए, 31 मार्च 2017 तक मूल धन के रूप में। साथ ही, 2263.67 करोड़ रुपये चुकाए हैं ब्याज के तौर पर। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब मेट्रो सौ रुपये कमाती है तो उनमें से 27 रुपये लोन चुकाने के लिए खर्च करने पड़ते हैं। इनमें से 11 रुपये मूलधन के होते हैं और 16 रुपये ब्याज के।

मेट्रो का खर्च
-100 रुपये कमाने के लिए इस वक्त मेट्रो 74 रुपये खर्च करती है यानी उसे सिर्फ 26 रुपये की बचत होती है। भविष्य में जब मेट्रो की ट्रेनें पुरानी हो जाएंगी तो उसे नया रोलिंग स्टॉक खरीदना होगा। उसके लिए मेट्रो को कुछ रकम बचानी होगी। दिल्ली मेट्रो की जो ट्रेनें हैं, उनकी लाइफ करीब 35 साल है यानी उसके बाद इन ट्रेनों को बदलना होगा। इससे पहले एक तय वक्त के बाद इन ट्रेनों की ओवर हॉलिंग भी करनी पड़ती है यानी ट्रेन के घिस चुके पुर्जों को बड़े पैमाने पर बदलना पड़ता है।

-100 रुपये कमाने के लिए 2008-2009 में मेट्रो को सिर्फ 55 रुपये खर्च करने पड़ते थे, यानी पिछले आठ साल में उसका खर्च बढ़ा है।
-1795 करोड़ रुपये था 2016-17 में मेट्रो का खर्चा लेकिन इस वित्त वर्ष के खत्म होने तक इसके बढ़कर 3127 करोड़ रुपये होने का अनुमान है।
-3.13 करोड़ रुपये प्रति किमी की लागत से हर साल मेंटनेंस पर खर्च करना पड़ता है मेट्रो को यानी एक किमी की लाइन की मेंटनेंस पर एक साल में 3.13 करोड़ रुपये का खर्च आता है।
-2.80 करोड़ रुपये प्रति किमी सालाना पड़ती है कर्मचारी लागत यानी एक किमी पर उसे कर्मचारियों पर साल भर में 2.80 करोड़ रुपये का खर्च करना होता है। इस तरह अगर मेट्रो की 100 किमी लाइन है तो 280 करोड़ रुपये प्रति कर्मचारी खर्च आता है।

‘सफर आसान, रोजगार के साधन’
इस कॉरिडोर के बनने से सफर तो आसाान होगा ही, साथ ही रोजगार के नए साधन मिलेंगे। भले ही शुरू में कुछ ट्रेनें जापान से आएं लेकिन उसके बाद बाकी ट्रेनें देश में ही बनाई जाएंगी। बाद में देश में बनी ट्रेनों का निर्यात भी किया जा सकेगा। इस तरह यह प्रॉजेक्ट तकनीक के मामले में हमारे लिए बड़ा मददगार साबित होगा।
अनिल सक्सेना, प्रवक्ता, इंडियन रेलवे

Source:- NavBharat Times

Category: Indian Railways, News

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