Railway can’t grow on its own, society must take responsibility

| August 27, 2017

कैसे मजबूत हो रेल जब है सबके गुस्से का पहला निशाना

नई दिल्ली : आंदोलन, धरना, हड़ताल और उपद्रव रेलवे के लिए मुसीबत बन गए हैं। इनके कारण रेलवे को हर साल करोड़ों रुपये का नुकसान ङोलना पड़ता है। यह ऐसी क्षति है जिसकी शायद ही कभी सीधे भरपाई होती है। नीतिगत व कानूनी प्रावधानों के अभाव में आखिरकार करदाताओं को ही इस बर्बादी का बोझ उठाना पड़ता है। देश में आए दिन कहीं न कहीं कोई न कोई आंदोलन होता रहता है। राजनीतिक दलों के अलावा ये आंदोलन किसानों, मजदूर संगठनों अथवा जातिगत समूहों द्वारा अपनी मांगों के समर्थन में सरकारों अथवा उद्योगों पर दबाव डालने के लिए किए जाते हैं।








डेरा मामले में भी रेलवे को भारी नुकसान हुआ है। न केवल सैकड़ों ट्रेनों का संचालन बंद रहा, बल्कि राम रहीम के समर्थकों ने कई जगहों पर रेल संपत्ति को निशाना भी बनाया और स्टेशनों व ट्रेनों में आग लगा दी। पंचकूला हाई कोर्ट ने क्षतिपूर्ति को डेरा से वसूली की बात कही है। सच्चाई यह है कि भरपाई जनता की जेबों से ही होती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2011 के जाट आंदोलन की सुनवाई में हरियाणा सरकार को रेलवे के नुकसान की भरपाई का आदेश दिया था।








लेकिन, इनके अनुपालन का रिकार्ड खोजना कठिन है। रेल मंत्रलय के अधिकारी का कहना है कि ज्यादातर आंदोलनों की प्रकृति राजनीतिक होती है, इसलिए रेलवे की ओर से क्षतिपूर्ति पर जोर देने की बजाए बजट से इसकी भरपाई कर ली जाती है।1नई दिल्ली में शुक्रवार को सीबीआइ की अदालत द्वारा यौन शोषण मामले में डेरा मुखी को दोषी करार दिए जाने के बाद आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर समर्थकों द्वारा जलाई गई ट्रेन की बोगियां

>आंदोलन कोई हो, रेलवे ट्रैक और ट्रेनें ही बनती हैं आसान लक्ष्य

>उपद्रवी रेल के मार्फत पूरी कराना चाहते हैं अपनी मांग

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Category: Indian Railways, News

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