रेलवे की विभागीय पदोन्नति में लागू नहीं होता आरक्षण : कैट

| August 26, 2017

बिलासपुर। केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण(कैट) ने दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में विभागीय पदोन्‍नति परीक्षा के लिए जारी अधिसूचना को निरस्त कर दिया है। कैट ने अपने आदेश में कहा कि विभागीय पदोन्‍नति में आरक्षण नियम लागू नहीं होगा। इसके साथ ही रेलवे को नई अधिसूचना जारी करने का निर्देश दिया है।








दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे ने सहायक कार्मिक अधिकारी ग्रुप बी के दो रिक्त पद को विभागीय पदोन्‍नति परीक्षा से भरने 9 सितंबर 2015 को अधिसूचना जारी की थी। एक पद सामान्य और एक एसटी वर्ग के लिए आरक्षित किया गया। इस अधिसूचना के खिलाफ बिलासपुर निवासी रेल कर्मी भास्कर गुहा ने कैट के सर्किट बेंच बिलासपुर में परिवाद पेश किया।




इसमें कहा गया कि एम. नागराज विरुद्ध भारत सरकार में सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्‍नति में आरक्षण नहीं देने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार किसी भी पदोन्‍नति में आरक्षण नहीं दिया जा सकता। इस तर्क को स्वीकार करते हुए कैट ने रेलवे की 9 सितंबर 2015 को जारी अधिसूचना निरस्त कर दी है। साथ ही नई अधिसूचना जारी कर रिक्त पदों को भरने का आदेश दिया है।




आदेश का रेलवे में होगा व्यापक असर

रेलवे में ग्रुप डी के कर्मचारियों को ग्रुप सी और ग्रुप सी के कर्मचारियों को ग्रुप बी के पद पर पदोन्‍नति देने का प्रावधान है। अब तक विभागीय पदोन्‍नति में आरक्षण रोस्टर का पालन किया जा रहा था। कैट के इस आदेश के बाद रेलवे में किसी भी विभागीय पदोन्‍नति में आरक्षण लागू नहीं होगा। विभागीय पदोन्‍नति परीक्षा में मेरिट में आने वाले कर्मचारी को पदोन्‍नति मिलेगी।

पदोन्नति में आरक्षण न देने के फैसले को चुनौती

 विसं, मुंबई : मुंबई उच्च न्यायालय ने सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण को रद्द कर दिया है, लेकिन अब राज्य सरकार उच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में जाएगी। यह जानकारी राज्य के सामाजिक न्याय राज्यमंत्री दिलीप कांबले ने दी है। उन्होंने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय में जाने माने वकील हरीश सालवे राज्य सरकार का पक्ष रखेंगे।

बता दें कि 5 अगस्त को अपने फैसले में मुंबई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र में सरकारी व अर्ध-सरकारी कार्यालयों में अधिकारियों और कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण देने वाला 25 मई 2004 का सरकारी निर्णय रद्द कर दिया था। वास्तव में, महाराष्ट्र सरकार ने 2001 में आरक्षण का कानून बनाया था। इसी आधार पर पदोन्नतियां देने का सरकारी-आदेश (जीआर) निकाला गया। इस जीआर को कई कर्मचारियों ने महाराष्ट्र प्रशासनिक न्यायाधिकरण (मैट) में चुनौती दी और ‘मैट’ ने इस आदेश को संविधान का उल्लंघन ठहराते हुए रद्द कर दिया था। इसी पर उच्च न्यायालय में अपील की गई थी। उच्च न्यायालय ने भी मैट के आदेश को बरकरार रखा। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में 12 सप्ताह के भीतर सरकार को जरूरी फेरबदल का आदेश दिया है, लेकिन साथ में आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में जाने के लिए तीन महीने का वक्त भी दिया है।

पिछले एक दशक से चल रहे इस विवादित मामले पर हाई कोर्ट को निर्णय को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देना राज्य सरकार के लिए लाजमी हो गया है। कहीं आरक्षण के आधार पर दी गईं सभी पदोन्नतियां रद्द करने का फैसला लागू करना पड़ा, तो पूरी सरकारी प्रकिया में हलचल मच जाएगी। सेवा-वरिष्ठता की सूची बदलने की प्रक्रिया तकलीफदेह और परेशानी भरी होगी।

2004 में जो जीआर जारी किया गया था उसमें सरकारी नौकरियों में पदोन्नति के लिए अनुसूचित जाति को 13 फीसदी, अनुसूचित जनजाति को 7 फीसदी , घूमंतू विमुक्ति (बंजारा) जाति -जमाति और विशेष तौर पर पिछड़े वर्गों के लिए 13 फीसदी आरक्षण लागू किया था।

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Category: Indian Railways, News

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