रेल मंत्री की मनाही पर भी दूनी कीमत में पुर्जे का आयात, सालाना 60 करोड़ रुपये का सरकार को लगाया चूना

| July 30, 2017

रेल मंत्री की मनाही पर भी दूनी कीमत में पुर्जे का आयात

नई दिल्ली रेल मंत्री और रेलवे बोर्ड के एतराज के बावजूद रेल विभाग की निर्माण इकाई डीजल लोकोमोटिव वर्क्‍स (डीएलडब्लू) के कारखाने ने अमेरिकी कंपनी से इंजन के महंगे पुर्जे का जमकर आयात किया। स्वदेशीकरण के बजाय वह उसी कंपनी से पुर्जे खरीदती रही, जिसके साथ तकनीक हस्तांतरण का समझौता किया था। उसने इस पुर्जे को स्वयं बनाने या स्वदेशी कंपनी से खरीदने की जहमत नहीं उठाई। देश को करोड़ों रुपये के घाटे के अलावा अरबों रुपये की विदेशी मुद्रा का नुकसान उठाना पड़ा है। डीएलडब्ल्यू रेलवे के लिए इंजनों (लोकोमोटिव) का निर्माण करता है। भारी मालगाड़ियां खींचने के लिए देश को हाई हार्स पावर (एचएचपी) लोकोमोटिव की जरूरत है। रेल मंत्रलय ने डीएलडब्लू से इन लोकोमोटिव का स्वदेश में निर्माण करने को कहा। चूंकि एचएचपी का सबसे अहम पुर्जा क्रैंककेस होता है लिहाजा, डीएलडब्ल्यू ने इसके निर्माण के लिए 1998-99 में अमेरिकी कंपनी ईएमडी (पूर्व नाम जनरल मोटर्स) के साथ 1.75 करोड़ डॉलर का टेक्नोलॉजी हस्तांतरण समझौता किया।








परंतु 2003 में प्रारंभ हुई स्वदेशीकरण की यह परियोजना आज तक पूरी नहीं हुई है। 1रेलवे बोर्ड ने डीएलडब्ल्यू को सालाना 100 क्रैंककेस के निर्माण लायक सुविधाएं खड़ी करने के लिए 1999 में 156 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की थी। बाद में 2008-09 में क्षमता को सालाना 150 क्रैंककेस तक बढ़ाने के लिए 98 करोड़ रुपये की राशि और मंजूर की गई। 1कैग के ऑडिट से पता चला है कि पूर्ववर्ती सरकार संप्रग के शासनकाल में डीएलडब्ल्यू ने अगस्त, 2012 में 168 क्रैंककेस की खरीद के लिए टेंडर जारी किए थे।




इस पर तीन कंपनियों ने कीमतें कोट कीं। इनमें 69.96 लाख प्रति यूनिट की सबसे कम कीमत पंचकुला की कंपनी ईसी ब्लेड्स एंड टूल की थी। परंतु डीएलडब्ल्यू की टेंडर कमेटी ने इस कंपनी के बजाय 124 लाख रुपये प्रति यूनिट की ऊंची कीमत कोट करने वाली तीसरे नंबर की कंपनी ईएमडी को आर्डर देने का सुझाव रेलवे बोर्ड को भेजा। परंतु बोर्ड ने यह कहते हुए उसे लौटा दिया कि कीमत बहुत ज्यादा है, लिहाजा इसकी तुलना स्वदेशी उत्पादन से की जाए। टेंडर कमेटी ने इस आधार पर जांच की तो पाया कि वास्तव में ईएमडी की कीमत स्वदेशी उत्पादन से 109 फीसद तक ज्यादा है। इसके बाद रेलवे बोर्ड ने मई, 2013 में डीएलडब्ल्यू से कहा कि वह ईएमडब्ल्यू से कीमत कम करने के बारे में बात करे। परंतु ईएमडब्ल्यू ने कीमत घटाने से इन्कार कर दिया।




आखिरकार, मोदी सरकार आने के बाद सितंबर, 2014 में रेल मंत्री के हस्तक्षेप के बाद डीएलडब्ल्यू को टेंडर रद करना पड़ा। लेकिन आयात नहीं रुका। डीएलडब्ल्यू के महाप्रबंधक ने अपने आपातकालीन अधिकारों का प्रयोग करते हुए सितंबर, 2014 से नवंबर, 2015 के दौरान पुराने टेंडर की आड़ में ईएमडी से 81 क्रैंककेस की खरीद कर ही डाली। इससे रेलवे को 59.28 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इससे पहले 2013-14 के दौरान भी डीएलडब्ल्यू ने इसी फर्म से 176 क्रैंककेस खरीदे थे। यह खरीद 127-149 लाख रुपये प्रति यूनिट की दरों पर की गई थी। ईएमडी से क्रैंककेस का आयात आज भी जारी है। पांच सालों में इस पर करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा खर्च हो चुकी है।’

>हाई हार्स पावर इंजन के निर्माण में स्वदेशी योजना का बनाया मखौल1’

>तकनीक हस्तांतरण समझौते के बावजूद खरीदे दोगुने महंगे पुर्जे

>करोड़ की विदेशी मुद्रा पांच सालों में खर्च,

           >>सालाना 60 करोड़ रुपये का सरकार को लगाया चूना

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Category: Indian Railways, News

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