Reduction in inflation will fulfill dream of cheaper Home

| July 30, 2017

कं ज्यूमर इन्फ्लेशन 1.99 पर्सेंट के रिकॉर्ड लो लेवल पर है। खुदरा महंगाई दर इतनी कम क्यों है/ क्या यह आगे भी कम बनी रहेगी/ इस सवाल के साथ कई गंभीर मसलों पर समझदार लोग इन दिनों विमर्श कर रहे हैं। जिन लोगों का बचत करने और उस पैसे को निवेश करने से लेना-देना है, उन्होंने पहली बार महंगाई दर और फिक्स्ड इनकम प्रॉडक्ट्स के रिटर्न के बीच इतना बड़ गैप देखा है। महंगाई दर कम होने की वजह से कुछ डिपॉजिट के लिए रियल रेट ऑफ रिटर्न 6 पर्सेंट सालाना हो गया है।







रघुराम राजन ने जितने रियल रेट ऑफ रिटर्न की वकालत की थी, यह उससे तीन से चार गुना अधिक है। यह भी संभव है कि दुनिया में सबसे अधिक रियल रेट ऑफ रिटर्न भारत में हो। जहां तक बचत करने वालों की बात है, यह रिटर्न पलक झपकाते ही खत्म हो सकता है। इसकी कई वजहें हैं। महंगाई दर के मौजूदा आंकड़े को अस्थायी माना जा रहा है। नोटबंदी और जीएसटी की वजह से शायद यह रिकॉर्ड निचले स्तर पर आई है। दूसरी बात यह है कि लॉन्ग टर्म में महंगाई दर के मुताबिक ही ब्याज दरें तय होंगी। ब्याज दरों को ऊंचा बनाए रखने के लिए रिजर्व बैंक की काफी आलोचना हो रही है। कहा जा रहा है कि इसी वजह से आर्थिक विकास दर कमजोर बनी हुई है।



ब्याज दरों में कमी की संभावना बढ़ गई है। अगर इंटरेस्ट रेट में कटौती होती है तो कर्ज लेने वालों को फायदा होगा। सबसे अधिक कर्ज केंद्र और राज्य सरकारें लेती हैं। उन्हें ब्याज दरों में कटौती से काफी लाभ होगा। कई कंपनियों को भी इससे राहत मिलेगी। हालांकि, कई ऐसी कंपनियां भी हैं, जिनकी हालत इतनी खराब हो चुकी है कि ब्याज दरों में कटौती से भी उनमें जान फूंके जाने की उम्मीद नहीं दिख रही है। वहीं, कई ऐसी कंपनियां हैं, जिनमें ब्याज दरों में कटौती से नई जान लौट सकती है। कंपनियों और सरकारों के लिए भले ही यह अच्छी खबर हो, लेकिन आम लोगों पर इसका नकारात्मक असर हो सकता है। मैं महंगाई दर के कम रहने से लंबी अवधि में अर्थव्यवस्था को होने वाले फायदे से इनकार नहीं कर रहा हूं, लेकिन इससे डिपॉजिट पर ब्याज बहुत कम हो सकता है। इससे आम लोगों को चोट पहुंचेगी, जो अपनी बचत का बड़ा हिस्सा स्मॉल सेविंग स्कीम में लगाते हैं।

हालांकि, इससे बड़ी संख्या में एक तबाही घरों की अनापशनाप कीमत के रूप में लोगों के सामने आने वाली है, जिसका पता महंगाई दर के आंकड़ों से नहीं चलता। कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स में हाउसिंग का वेटेज 21.67 पर्सेंट है। औसत के तौर पर यह शायद सही हो, लेकिन हाउसिंग खर्च का नेचर ऐसा है, जिससे यह भ्रामक लगता है। हर इंसान कभी न कभी अपना घर खरीदना चाहता है। घर पर वह अपनी बचत का बड़ा हिस्सा खर्च करता है। पहले तो वह डाउनपेमेंट के तौर पर बचत का बड़ा हिस्सा खर्च करता है और उसके बाद वह बड़ा कर्ज भी लेता है।



घरों की कीमत देखते हुए मुझे लगता है कि सैलरीड क्लास करीब 10 साल या इससे अधिक समय तक 40-50 पर्सेंट कमाई लोन चुकाने पर खर्च करता है। अगर आप इसमें पिछली बचत की रकम जोड़ें तो पर्सेंटेज में खर्च और बढ़ जाता है। इसलिए कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स में 21.67 पर्सेंट के वेटेज से इसकी सही तस्वीर सामने नहीं आती।

जब भी ब्याज दरों में कटौती की खबर आती है तो टीवी और अखबारों में ईएमआई में कमी का दावा किया जाता है। यह गलत नहीं है, लेकिन घरों के दाम में हम जो बढ़ोतरी देख चुके हैं, उसकी तुलना में इसकी कोई अहमियत नहीं थी। 20 साल पहले की तुलना में हाउसिंग लोन की ब्याज दर आधी रह गई है, लेकिन इस बीच घर की कीमत में पांच से 10 गुना की बढ़ोतरी भी हुई। घरों के दाम कुछ समय से स्थिर बने हुए हैं, लेकिन उनमें बदलाव नहीं आया है। नोटबंदी और जीएसटी के चलते काले धन का प्रवाह रियल एस्टेट सेक्टर में कम होने की उम्मीद बंधी है। इससे लंबे समय तक घरों के दाम में बढ़ोतरी नहीं होगी या इनमें गिरावट भी आ सकती है। अगर कम महंगाई दर का सपना सच होता है तो इससे वाजिब कीमत पर घर खरीदने का हर किसी का ख्वाब भी पूरा होगा।

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Category: Banking, Home Loans, News

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