सरकारी कर्मियों को धारा 33 के अंदर ले आना चाहिए और इनके मौलिक अधिकारों को निरस्त कर देना चाहिए

| July 27, 2017

सरकार ने एयर इंडिया के निजीकरण का निर्णय लिया है, जो स्वागत योग्य है। निजीकरण से पूर्व कंपनी के 40,000 कर्मियों में से लगभग 15,000 को स्वैच्छिक रिटायरमेंट दिया जाएगा। इन्हें कंपनी छोड़ने के लिए मोटी रकम दी जाएगी। इसके बाद कंपनी पर कर्मियों का वजन घट जाएगा। सरकार को आशा है कि तब कंपनी को अच्छे मूल्य पर खरीदने के लिए खरीदार आगे आएंगे। दूसरी केंद्रीय सार्वजनिक इकाइयों की स्थिति और गड़बड़ है। एचएमटी वाचेज, तुंगभद्रा स्टील तथा हिंदुस्तान केबल जैसी कई इकाइयों में पिछले दशक में रत्ती भर उत्पादन नहीं हुआ है, पर इन इकाइयों के कर्मियों को घर बैठे पूरा वेतन दिया जा रहा है।








मेरे एक सहपाठी गोरखपुर की फर्टिलाइजर फैक्ट्री में कार्यरत हैं। फैक्ट्री 20 वर्षों से बंद है। वे महीने में एक बार ऑफिस जाते हैं, अटेंडेंस रजिस्टर पर दस्तखत करते है और पूरा वेतन उठाते हैं। और तो और इन्हें वेतन वृद्धियां भी दी जा रही हैं। सार्वजनिक इकाइयों द्वारा दो तरह से सुविधाएं हासिल की जाती हैं। एक तरफ इन्हें स्वायत्तता दी जाती है। जैसे एक बंद इकाई के कर्मी को दूसरी इकाई में ट्रांसफर नहीं किया जा सकता है। एयर इंडिया को मनचाही अनावश्यक नियुक्तियां करने का अधिकार है, चूंकि यह कंपनी स्वायत्त है। दूसरी तरफ इनके कर्मचारियों को सरकारी कर्मियों की तर्ज पर जॉब सिक्योरिटी, वेतन वृद्धि, आदि दी जाती है। बराबरी और अधिकार




इन इकाइयों को या तो कमर्शल इकाई के तर्ज पर देखा जाना चाहिए अथवा सरकारी विभाग की तर्ज पर। इन्हें कमर्शल इकाई माना जाए तो बंद इकाइयों के कर्मियों को घर बैठे वेतन देने का कोई औचित्य नहीं बनता है। इकाई के बंद होने के साथ लेबर लॉज के अनुसार इन्हें रिट्रेंचमेंट कम्पनसेशन देकर नमस्ते कर देना चाहिए। एयर इंडिया के सरप्लस कर्मियों को स्वैच्छिक रिटायरमेंट पैकेज देने के स्थान पर रिट्रेंच कर देना चाहिए। इसके विपरीत यदि इन्हें सरकारी विभाग की तर्ज पर देखा जाता है तो इनकी स्वायत्तता छीन ली जानी चाहिए और सरप्लस कर्मियों को एक केंद्रीय पूल में डाल देना चाहिए जहां से दूसरे सरकारी विभाग अथवा दूसरी सार्वजनिक इकाइयां इन्हें उठा सकें।




ऐसी ही विसंगति सभी सरकारी कर्मियों के संदर्भ में दिखती है। सरकारी कर्मियों की नियुक्ति जनता की सेवा करने के लिए की जाती है। जैसे पियन द्वारा अधिकारी की सेवा की जाती है उसी तरह सरकारी कर्मियों द्वारा जनता की सेवा करने का विधान है। जनता बड़ी और सरकारी कर्मी उनके सेवक। पर वस्तुस्थिति इसके ठीक विपरीत है। इनके द्वारा जनता के समकक्ष मौलिक अधिकारों की मांग की जाती है। जैसे प्रमोशन, डीए, ट्रांसफर आदि में इनके द्वारा कोर्टों में तमाम विवाद दायर किए जाते है। जिस प्रकार जनता को सरकारी कर्मियों के गलत कदमों के विरुद्ध कोर्ट में जाने का अधिकार है उसी तरह अपने शीर्ष अधिकारियों के कृत्यों के विरुद्ध इन्हें भी कोर्ट जाने का अधिकार है। यानी अपने मौलिक अधिकारों के संदर्भ में सरकारी कर्मियों द्वारा जनता की बराबरी की जाती है। लेकिन वेतन, जॉब सिक्योरिटी आदि के संदर्भ में ये जनता से ऊपर उठकर विशेष दर्जे की मांग करते है। ये जॉब पर न आएं तो 2-4 दिन के लिए सस्पेंड किए जाते है। घूस लेते पकड़ लिए जाएं तो ट्रांसफर की ‘महान’ सजा के ये पात्र होते हैं। इन्हें कोई छड़ी से भी छू नहीं सकता है।

इस प्रकार इन्होंने दोनों स्तर की सुविधाएं हासिल कर रखी हैं। इन्हें दोनों में से कोई एक हैसियत दी जानी चाहिए। यदि ये जनता की बराबरी करते है तो इनकी जॉब सिक्योरिटी छीन ली जानी चाहिए। इसके विपरीत यदि ये जनता से ऊंचा बैठना चाहते है तो इनके मौलिक अधिकार छीन लेने चाहिए। इन्हें आर्मी के जवानों की तर्ज पर रखना चाहिए। आर्मी के जवानों की नियुक्ति देश की रक्षा के लिए की जाती है। सरकारी कर्मियों की नियुक्ति देशवासियों की सेवा के लिए की जाती है।

दोनों ही नियुक्तियां अलग-अलग तरह से देश की सेवा के लिए की जाती है। हमारे संविधान की धारा 33 के अंतर्गत आर्मी के जवानों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित किया गया है। इस धारा का विस्तार करके सभी सरकारी कर्मियों को धारा 33 के अंदर ले आना चाहिए और इनके मौलिक अधिकारों को निरस्त कर देना चाहिए। यदि ये सरकारी जॉब सिक्योरिटी चाहते हैं तो इन्हें अपने मौलिक अधिकार छोड़ने होंगे। तब सरकार द्वारा इनसे कसकर काम लेना संभव होगा और जनता के प्रति इनके आतंक पर कुछ नियंत्रण संभव हो सकेगा। संविधान की व्यवस्था

सरकारी कर्मियों के मौलिक अधिकारों को निरस्त करने से ये नेताओं के गलत फरमानों का विरोध नहीं कर सकेंगे। संविधान में व्यवस्था है कि विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यापालिका एक दूसरे पर नियंत्रण रखती हैं। मौलिक अधिकार उपलब्ध होने से कार्यपालिका द्वारा विधायिका यानी नेताओं के गलत फरमानों का विरोध किया जा सकता है। पर इनके निरस्त होने से ये पूरी तरह विधायिका पर आश्रित हो जाएंगे।

लेकिन पिछले 70 वर्षों का अनुभव बताता है कि सरकारी कर्मियों द्वारा अपने मौलिक अधिकारों का उपयोग जनता के शोषण के लिए अधिक और विधायिका पर नियंत्रण के लिए कम किया गया है। वास्तव में इनकी कहीं भी जवाबदेही नहीं रह गई है। विधायिका और कार्यपालिका ने एक अपवित्र गठबंधन बना लिया है। दोनों मिलकर जनता का शोषण कर रही हैं। फिर भी विधायिका उत्तम है क्योंकि नेताजी को 5 वर्षों के बाद चुनाव लड़ने होते है और जनता को जवाब देना होता है। कार्यपालिका की जवाबदेही केवल विधायिका के प्रति है। जब इसकी जवाबदेही विधायिका के माध्यम से ही है तो उस जवाबदेही को सुदृढ़ बनाना चाहिए। सरकारी कर्मियों की फर्जी जवाबदेही के भ्रम से हमें उबरना चाहिए। इनके मौलिक अधिकारों को निरस्त करना चाहिए।
ये नौकरी में मिलने वाली सभी सुविधाएं भी चाहते हैं और तमाम अधिकार भी

65749

Source:- NavBharat Times

Category: News

About the Author ()

Comments are closed.