Railway to provide smooth and jerk free travel to passengers

| January 11, 2015

Railway to provide smooth and jerk free travel to passengers

Indian Railway has intensified its efforts to provide smooth and jerk free travelling to passengers. Passengers were complaining about this for quite some time. Railway will do massive modifications in design of coaches to provide smooth travel. Please read this post:-

नई दिल्ली। राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस जैसी सुपरफास्ट ट्रेनों में लगने वाले झटके बीते दिनों की बात हो सकती है। झटके रोकने के लिए रेलवे ने व्यापक बदलाव करने के लिए सोमवार को हरी झंडी दे दी। इन ट्रेनों के कोचों को जोड़ने वाले सेंट्रल बफर कपलर (सीबीसी) के डिजाइन में बदलाव किए जा सकते हैं। नए डिजाइन के कपलर कारगर हैं या नहीं, इसके लिए इसी महीने नई दिल्ली और लखनऊ के बीच चलने वाली लखनऊ शताब्दी में ट्रायल शुरू होगा। उल्लेखनीय है कि राजधानी, शताब्दी जैसे सुपरफास्ट ट्रेनों में अत्याधुनिक एलएचवी कोच होते हैं। तकनीकी खामियों की वजह से इन ट्रेनों के रूकने और चलने के समय झटके लगते हैं।

लगातार मिल रही थी शिकायतें

रेलवे बोर्ड के एक आला अधिकारी ने बताया कि सुपरफास्ट ट्रेनों के रुकने और चलने के समय झटके लगने की शिकायतें लगातार मिलती हैं। कुछ वीआईपी ट्रेनों में तो जोर के झटके लगने की भी सूचनाएं हैं। झटके क्यों लगते हैं? झटकों को रोकने के क्या-क्या उपाय हो सकते हैं? ऐसे कई सवालों के हल के लिए अध्ययन करने का निर्णय लिया गया है। इसी महीने 12 या 14 को नई दिल्ली और लखनऊ के बीच चलने वाली शताब्दी ट्रेन में अध्ययन शुरू होगा।

ट्रेनों में क्यों महसूस होते है झटके

उत्तर रेलवे के मेकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के एक आला अधिकारी ने बताया कि लगभग डेढ़ दशक पहले जब जर्मन कंपनी से एलएचवी तकनीक ली गई थी, उस समय कोचों को जोड़ने वाले सीबीसी का डिजाइन मौजूदा सीबीसी के डिजाइन से अलग था। जर्मनी में रेलगाड़ियां छोटी होती हैं, जबकि भारत में काफी लंबी होती है इसलिए सीवीसी के डिजाइन में बदलाव किया गया था। उन्होंने बताया कि सीबीसी का मुख्यतः दो काम होते हैं, पहला ट्रेन को खिंचना और दूसरा ब्रेक लगने के समय कंप्रेशन तैयार करना। 22 से 26 कोचों के ट्रेन में जब ब्रेक लगता है तो दो सीबीसी के बीच गैप बन जाता है। इस वजह से ट्रेन के रुकने या चलने के वक्त झटके महसूस किए जाते हैं।

एक साल में पूरी होगा प्रक्रिया

इस समस्या को दूर करने के लिए नए तरह के सीबीसी बनाए गए हैं। प्रयोगशाला में इसकी जांच भी हो चुकी है। अब ट्रेन में लगाकर जांच की जाएगी। लगभग छह महीनों तक जांच की जाएगी। अगर जांच सफल रही तो नए डिजाइन के सीबीसी बनाए जाएंगे। पूरी प्रक्रिया में कम से कम एक साल का वक्त लग सकता है।

सुरक्षा के लिहाज से भी उपयुक्त

लखनऊ शताब्दी में ही सर्वप्रथम एलएचवी कोच लगाए गए थे। कपूरथला कोच फैक्ट्री में इन कोचों का निर्माण किया जाता है। वर्तमान में सभी राजधानी, शताब्दी और कुछ एक्सप्रेस ट्रेनों में इन कोचों का इस्तेमाल किया जाता है। शुरूआती दौर में भी इन कोचों में लगने वाले कपलिंग के अलग हो जाने की शिकायतें मिली थी। दुर्घटना की स्थिति में एलएचवी कोचों के एक-दूसरे के ऊपर चढ़ने की आशंका काफी कम होती है। एक कोच दूसरे के अंदर घुसता भी नहीं है, इसलिए सुरक्षा के मद्देनजर काफी अच्छे माने जाते हैं ।

 

Category: Indian Railways, News

About the Author ()

Comments are closed.