इन्कम टैक्स एग्जेम्प्शन लिमिट को महंगाई से लिंक करने पर बढ़ेगी टैक्स सेविंग्स

| May 2, 2014

इन्कम टैक्स एग्जेम्प्शन लिमिट को महंगाई से लिंक करने पर बढ़ेगी टैक्स सेविंग्स

सरकार टैक्स छूट और स्लैब को इनफ्लेशन से लिंक नहीं कर रही है। इससे वह असल में आपसे ज्यादा टैक्स वसूल करना चाहती है। फाइनैंस मिनिस्ट्री ने पिछले हफ्ते प्रस्तावित डायरेक्ट टैक्स कोड का एक और ड्राफ्ट जारी किया। उसने ऐसा क्यों यह समझ नहीं आया क्योंकि कुछ हफ्तों में नई सरकार बनने वाली है। लेकिन इसमें कुछ मजेदार बदलाव किए गए हैं। उससे भी ज्यादा मजेदार यह है कि प्रस्तावित बदलाव खारिज कर दिए गए हैं।

फाइनैंस पर संसद की स्थायी समिति ने कई सुझाव दिए हैं। उनमें से कुछ मान लिए गए हैं तो कुछ खारिज कर दिए गए हैं। जिन सुझावों को खारिज किया गया है, उनमें से एक छूट की लिमिट को कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) से लिंक करना है। कमिटी ने इसके लिए एकदम साफ दलील दी थी। कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स बेस्ड इनफ्लेशन 10 फीसदी है। ऐसे में टैक्स छूट की लिमिट चेंज नहीं किए जाने से आपकी रीयल परचेजिंग पावर में कमी आएगी। पिछले साल दो लाख में जो चीजें खरीदी जा सकती थीं, इस बार नहीं मिल सकतीं।

टैक्स छूट की लिमिट में चेंज क्यों नहीं किया गया? फाइनैंस मिनिस्ट्री ने सुझाव खारिज करने की जो दलील दी है, वो मजेदार है। उसने कहा, ‘टैक्स छूट की लिमिट को CPI से लिंक करना कई वजहों से व्यावहारिक नहीं होगा। पहला तो यह साफ नहीं है कि WPI के बजाय CPI को ही क्यों बेस बनाया जाना चाहिए। अगर इंडेक्स का बेस कमोडिटी बास्केट बदलने पर जटिलताएं बढ़ेंगी। दूसरा, इसमें होने वाले चेंज होल नंबर के मल्टीपल में नहीं होंगे। तीसरा, स्लैब को इनफ्लेशन इंडेक्स से लिंक करना व्यापक तरीका नहीं है क्योंकि स्लैब स्ट्रक्चर कई फैक्टर्स पर डिपेंड करता है, जिनमें टैक्सपेयर्स को दी जाने वाली राहत, सरकार को संभावित रेवेन्यू लॉस और चेंज की वजह से टैक्स के दायरे से बाहर निकलने वाले टैक्सपेयर्स की संख्या शामिल है।’

यह बात तो साफ है कि ये दिक्कतें सिद्धांत में नहीं बल्कि चीजों को लागू करने में आती हैं। इसके अलावा WPI और CPI में किसी एक को चुनना और इसमें बदलाव आने की बात समझना मुश्किल है। इन दलीलों को सही साबित नहीं किया जा सकता। असल में कैपिटल गेंस एडजस्टमेंट के लिए इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की तरफ से हर साल जारी कॉस्ट इनफ्लेशन इंडेक्स को चुनकर होल नंबर और इंडेक्स के चुनाव की दलील को खारिज किया जा सकता है। यह इंडेक्स इसी तरह के कैलकुलेशन के लिए है।

स्लैब इनफ्लेशन के हिसाब से बढ़ते हैं तो उनका एडजस्टमेंट जनता पर उनके हक नहीं बल्कि एहसान की तरह किया जाता है। लेकिन एक ऐसी लिमिट है जिसे एक दशक से एडजस्ट नहीं किया गया है: टैक्स सेविंग इनवेस्टमेंट्स में एक लाख की लिमिट। यह लिमिट 2005 से चली आ रही है, जबकि इनफ्लेशन के चलते इसकी रियल वैल्यू घटकर 47,000 रुपये रह गई है। अगले बजट तक यह और कम हो जाएगा। टैक्स सेविंग इनवेस्टमेंट के रियल लेवल में गिरावट का लोगों की बचत करने की आदत पर नेगेटिव असर हुआ है। मुश्किल हालात में बहुत से मिडल क्लास सैलरी वालों की बचत इसी लिमिट की वजह से हो पाती है। लंबे समय से इसको एडजस्ट नहीं करके फाइनेंस मिनिस्टर्स ने असल में टैक्स की देनदारी बढ़ा दी जबकि बचत में कमी करा दी है।

Category: Income Tax, News, Personal Fianance

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